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Rigveda / 10 / 68 / 9

सोषाम॑विन्द॒त्स स्व१॒॑: सो अ॒ग्निं सो अ॒र्केण॒ वि ब॑बाधे॒ तमां॑सि । बृह॒स्पति॒र्गोव॑पुषो व॒लस्य॒ निर्म॒ज्जानं॒ न पर्व॑णो जभार ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 68 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : अयास्यः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : सः । उ॒षाम् । अ॒वि॒न्द॒त् । सः । स्व१॒॑रिति॑ स्वः॑ । सः । अ॒ग्निम् । सः । अ॒र्केण॑ । वि । ब॒बा॒धे॒ । तमां॑सि । बृह॒स्पतिः॑ । गोऽव॑पुषः । व॒लस्य॑ । निः । म॒ज्जान॑म् । न । पर्व॑णः । ज॒भा॒र॒ ॥ १०.६८.९

पदार्थ : (सः-उषाम्) वह आत्मा अज्ञान को नष्ट करनेवाली ज्ञानज्योति को प्राप्त करता है (सः-स्वः) वह सुख को प्राप्त करता है (सः-अग्निम्) वह अपने शरीर के नायक परमात्मा को प्राप्त करता है (सः-अर्केण तमांसि विबबाधे) ज्ञानप्रकाशक मन्त्र से अज्ञान अन्धकारों को दूर करता है (गोवपुषः) वाणियों के शरीर अर्थात् वेद से (वलस्य) आवरक अज्ञान के (मज्जानम्) मज्जा के समान प्रभाव को (पर्वणः-निर्जभार) तृप्ति करनेवाले परमात्मज्ञान से नष्ट करता है-क्षीण करता है ॥९॥

भावार्थ : आत्मा वेदप्रकाश के द्वारा अपने अन्दर से अज्ञानान्धकार को हटाकर परमात्मा का साक्षात्कार करता है। सब प्रकार के दुःखों से दूर होकर अनन्त सुख को भी प्राप्त करता है ॥९॥