Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 70 / 5

दि॒वो वा॒ सानु॑ स्पृ॒शता॒ वरी॑यः पृथि॒व्या वा॒ मात्र॑या॒ वि श्र॑यध्वम् । उ॒श॒तीर्द्वा॑रो महि॒ना म॒हद्भि॑र्दे॒वं रथं॑ रथ॒युर्धा॑रयध्वम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 70 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : सुमित्रो वाध्र्यश्चः | देवता : आप्रियः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : दि॒वः । वा॒ । सानु॑ । स्पृ॒शत॑ । वरी॑यः । पृ॒थि॒व्या । वा॒ । मात्र॑या । वि । श्र॒य॒ध्व॒म् । उ॒श॒तीः । द्वा॒रः॒ । म॒हि॒ना । म॒हत्ऽभिः॑ । दे॒वम् । रथ॑म् । र॒थ॒ऽयुः । धा॒र॒य॒ध्व॒म् ॥ १०.७०.५

पदार्थ : (द्वारः) हे द्वार के समान सुशोभित गृहदेवियों-गृहमहिलाओं ! अथवा इन्द्रियद्वारों से निकली हुई शुभवृत्तियों ! (दिवः-वा सानु स्पृशत) मोक्ष-धाम के-स्वर्ग के भजनीय सुख को प्राप्त करो (पृथिव्याः-वा वरीयः) प्रथित सृष्टि के महत्तर सुख को (मात्रया विश्रयध्वम्) आंशिकरूप से सेवन करो (उशतीः) कामना करती हुई (महिना महद्भिः) गुणमहत्त्व से महान् विद्वानों से स्वीकृत तथा अनुमोदित (देवं रथं रथयुः-धारयध्वम्) रमणीय मोक्ष या गृहस्थ के रमण को चाहते हुए धारण करो ॥५॥

भावार्थ : घर की महिलाएँ अथवा प्रत्येक मनुष्य की इन्द्रियवृत्तियाँ सृष्टि के भोगों को आंशिकरूप में भोगें। इसी में कल्याण है, अधिक सेवन में नहीं। तथा महान् विद्वानों द्वारा सेवित तथा अनुमोदित विशेषरूप से मोक्षधाम का सुख, साधारणरूप से गृहस्थ का सुख भोगने योग्य है ॥५॥