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Rigveda / 10 / 75 / 9

सु॒खं रथं॑ युयुजे॒ सिन्धु॑र॒श्विनं॒ तेन॒ वाजं॑ सनिषद॒स्मिन्ना॒जौ । म॒हान्ह्य॑स्य महि॒मा प॑न॒स्यतेऽद॑ब्धस्य॒ स्वय॑शसो विर॒प्शिन॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 75 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : सिन्धुक्षित्प्रैयमेधः | देवता : नद्यः | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : सु॒खम् । रथ॑म् । यु॒यु॒जे॒ । सिन्धुः॑ । अ॒श्विन॑म् । तेन॑ । वाज॑म् । स॒नि॒ष॒त् । अ॒स्मिन् । आ॒जौ । म॒हान् । हि । अ॒स्य॒ । म॒हि॒मा । प॒न॒स्यते॑ । अद॑ब्धस्य । स्वऽय॑शसः । वि॒ऽर॒प्शिनः॑ ॥ १०.७५.९

पदार्थ : (सिन्धुः) जो सुखों को बहाता है, वह परमात्मा (अश्विनं सुखं रथं-युयुजे) व्यापनेवाले सुखसाधक रमणीय मोक्ष या जगत् को हमारे लिए युक्त करता है (तेन-अस्मिन्-आजौ) उससे इस प्राप्तव्य भोगस्थान में (वाजं सनिषत्) आनन्दभोग को सम्भाजित करता है (अस्य-अदब्धस्य) इस अहिंसित (स्वयशसः-विरप्शिनः) स्वाधार यशवाले महान् परमात्मा की (महान् हि महिमा पनस्यते) ऊँची ही महिमा प्रशस्त की जाती है-गाई जाती है ॥९॥

भावार्थ : परमात्मा सुखों को प्रवाहित करनेवाला महान् सिन्धु है। वह हमारे लिए मोक्षानन्द तथा जगत् के सुख को प्रदान करता है, उसकी महिमा महान् है, हमें उसके यश का और गुणों का गान करना चाहिए ॥९॥