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Rigveda / 10 / 76 / 8

ए॒ते न॑र॒: स्वप॑सो अभूतन॒ य इन्द्रा॑य सुनु॒थ सोम॑मद्रयः । वा॒मंवा॑मं वो दि॒व्याय॒ धाम्ने॒ वसु॑वसु व॒: पार्थि॑वाय सुन्व॒ते ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 76 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : जरत्कर्ण ऐरावतः सर्पः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : ए॒ते । न॒रः॒ । सु॒ऽअप॑सः । अ॒भू॒त॒न॒ । ये । इन्द्रा॑य । सु॒नु॒थ । सोम॑म् । अ॒द्र॒यः॒ । वा॒मम्ऽवा॑मम् । वः॒ । दि॒व्याय॑ । धाम्ने॑ । वसु॑ऽवसु । वः॒ । पार्थि॑वाय । सु॒न्व॒ते ॥ १०.७६.८

पदार्थ : (एते) ये (अद्रयः) मन्त्रवचन पढ़नेवाले (नरः) जीवन्मुक्त (स्वपसः) शोभन कर्मवाले (अभूतन) तुम हो (ये) जो (इन्द्राय परमात्मा के लिए (सोमम्) उपासनारस को (सुनुथ) सम्पादित करते हो (वः) तुम्हारा (वामं वामम्) श्रेष्ठ श्रेष्ठ स्तुति वचन (दिव्याय धाम्ने) मोक्षधाम के लिए मोक्षप्राप्ति के लिए है (वसु वसु) प्रत्येक सामान्य धन (पार्थिवाय) पार्थिव शरीर के लिए (सुन्वते) सुखसम्पादन के लिए तुम समर्थ हो ॥८॥

भावार्थ : जीवन्मुक्त महानुभावों के प्रवचन मोक्षानन्द के लिए तथा सांसारिक सुख के लिए भी होते हैं, उन का सत्सङ्ग करना आवश्यक है ॥८॥