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Rigveda / 10 / 77 / 5

यू॒यं धू॒र्षु प्र॒युजो॒ न र॒श्मिभि॒र्ज्योति॑ष्मन्तो॒ न भा॒सा व्यु॑ष्टिषु । श्ये॒नासो॒ न स्वय॑शसो रि॒शाद॑सः प्र॒वासो॒ न प्रसि॑तासः परि॒प्रुष॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 77 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : स्यूमरश्मिर्भार्गवः | देवता : मरूतः | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : यू॒यम् । धूः॒ऽसु । प्र॒ऽयुजः॑ । न । र॒श्मिऽभिः॑ । ज्योति॑ष्मन्तः । न । भा॒सा । विऽउ॑ष्टिषु । श्ये॒नासः॑ । न । स्वऽय॑शसः । रि॒शाद॑सः । प्र॒वासः॑ । न । प्रऽसि॑तासः । प॒रि॒ऽप्रुषः॑ ॥ १०.७७.५

पदार्थ : (यूयम्) हे विद्वानों ! तुम (धूर्षु प्रयुजः) धारणीय ज्ञानप्रबन्धों में प्रकृष्टरूप से नियुक्त करनेवाले होते हुए (रश्मिभिः-न) जैसे लगामों से घोड़ों को नियोजित करते हैं, वैसे हमें नियुक्त करो (भासा ज्योतिष्मन्तः-न) जैसे ज्ञानज्योति ज्ञान का प्रकाश करते हुए (व्युष्टिषु) विशिष्ट ज्ञान-स्थलियों में मनुष्यों के लिए ज्ञानज्योति प्रदान करते हो, उसी भाँति (श्येनासः-न) अथवा प्रशंसनीय (स्वयशसः) स्वाधार यशवाले महात्मा अथवा (रिशादसः-प्रवासः-न) हिंसक दोषों को फेंकनेवाले प्रवास करते हुए अतिथि प्रवक्ता जन (प्रसितासः परिप्रुषः) प्रकृष्ट निर्मल पवित्राचरण अपने उपदेश अमृत से मनुष्यों को सब ओर से सींचते हैं, वैसे हम पर अनुग्रह करें ॥५॥

भावार्थ : विद्वान् जन अपनी ज्ञानस्थलियों में हमें नियुक्त करें, ज्ञान से और शुभाचरण से हमें प्रसाधित करें। जैसे वे यशस्वी हैं, वैसे हमें उपदेशामृत देकर निर्दोष बनाएँ ॥५॥