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Rigveda / 1 / 186 / 8

उ॒त न॑ ईं म॒रुतो॑ वृ॒द्धसे॑ना॒: स्मद्रोद॑सी॒ सम॑नसः सदन्तु। पृष॑दश्वासो॒ऽवन॑यो॒ न रथा॑ रि॒शाद॑सो मित्र॒युजो॒ न दे॒वाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 186 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब पवन आदि के दृष्टान्त से विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : उ॒त। नः॒। ई॒म्। म॒रुतः॑। वृ॒द्धऽसे॑नाः॒। स्मत्। रोद॑सी॒ इति॑। सऽम॑नसः। स॒द॒न्तु॒। पृष॑त्ऽअश्वासः। अ॒वन॑यः। न। रथाः॑। रि॒शाद॑सः। मि॒त्र॒ऽयुजः॑। न। दे॒वाः ॥ १.१८६.८

पदार्थ : (मरुतः) पवन (ईम्) जल को जैसे वैसे (वृद्धसेनाः) बढ़ी हुई प्रौढ़ तरुण प्रचण्ड बल वेगवाली जिनकी सेना वे (नः) हम लोगों को (सदन्तु) प्राप्त होवें (उत) और (समनसः) समान जिनका मन वे परोपकारी विद्वान् (स्मत्) ही (रोदसी) आकाश और पृथिवी को प्राप्त हों (पृषदश्वासः) पुष्ट जिनके घोड़ा वे विद्वान् जन वा (अवनयः) भूमि (रथाः) रमणीय यानों के (न) समान (रिशादसः) रिसहा शत्रुओं को नाश कराते और (मित्रयुजः) मित्रों के साथ संयोग रखते उन (देवाः) विद्वानों के (न) समान होते हैं ॥ ८ ॥

भावार्थ : जिनकी वीर सेना जो समान मति रखनेवाले बड़े बड़े रथादि यान जिनके तीर (=पास) पृथिवी के समान क्षमाशील मित्रप्रिय विद्वान् जन सबका प्रिय आचरण करते हैं, वे प्रसन्न होते हैं ॥ ८ ॥