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Rigveda / 10 / 85 / 10

मनो॑ अस्या॒ अन॑ आसी॒द्द्यौरा॑सीदु॒त च्छ॒दिः । शु॒क्राव॑न॒ड्वाहा॑वास्तां॒ यदया॑त्सू॒र्या गृ॒हम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 85 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : सूर्या सावित्री | देवता : सूर्याविवाहः | छन्द : विराडनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : मनः॑ । अ॒स्याः॒ । अनः॑ । आ॒सी॒त् । द्यौः । आ॒सी॒त् । उ॒त । छ॒दिः । शु॒क्रौ । अ॒न॒ड्वाहौ॑ । आ॒स्ता॒म् । यत् । अया॑त् । सू॒र्या । गृ॒हम् ॥ १०.८५.१०

पदार्थ : (अस्याः-अनः) इस तेजस्विनी वधू का शकट-यान गृहस्थ की ओर जाने के लिए (मनः-आसीत्) मन है, मन से ही विहार-विचार करती है, जिससे कि (उत) और (छदिः-द्यौः-आसीत्) मनोरूप शकट का आवरण कामना करता हुआ नर है (अनड्वाहौ) शकट के दो वृषभ मानसिक और शरीरिक पराक्रम हैं (यत् सूर्या गृहम्-अयात्) जब तेजस्विनी वधू पतिगृह को जाती है ॥१०॥

भावार्थ : वधू का विवाह हो चुकने पर पति के घर जाने के लिए आन्तरिक दृष्टि से यान-गाड़ी मन है और उसका आवरण या रक्षक पति है, मानसिक और शारीरिक पराक्रम विचार और क्रिया गृहस्थ में प्रवेश कराते हैं, इनके बिना गृहस्थ नहीं चला करता है ॥१०॥