Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 85 / 26

पू॒षा त्वे॒तो न॑यतु हस्त॒गृह्या॒श्विना॑ त्वा॒ प्र व॑हतां॒ रथे॑न । गृ॒हान्ग॑च्छ गृ॒हप॑त्नी॒ यथासो॑ व॒शिनी॒ त्वं वि॒दथ॒मा व॑दासि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 85 | Mantra No : 26

In Hindi:

ऋषि : सूर्या सावित्री | देवता : नृर्णा विवाहमन्त्रा आशीः प्रायाः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : पू॒षा । त्वा॒ । इ॒तः । न॒य॒तु॒ । ह॒स्त॒ऽगृह्य॑ । अ॒श्विना॑ । त्वा॒ । प्र । व॒ह॒ता॒म् । रथे॑न । गृ॒हान् । ग॒च्छ॒ । गृ॒हऽप॑त्नी । यथा॑ । असः॑ । व॒शिनी॑ । त्वम् । वि॒दथ॑म् । आ । व॒दा॒सि॒ ॥ १०.८५.२६

पदार्थ : (त्वा-इतः) हे वधू ! तुझे इस पितृगृह से (हस्तगृह्य) तेरा हाथ ग्रहण किया, जिसने ऐसा (पूषा) पोषणकर्ता पति (नयतु) अपने घर में ले जाता है (अश्विना रथेन) गतिशक्तिवाले दो वाहक, रथ से (त्वा प्र वहताम्) तुझे पतिगृह में ले जाते हैं (गृहपत्नी) गृहस्वामिनी होती हुई (गृहान् गच्छ) घरों में-घरवालों में जा रही है (यथा त्वं वशिनी) जिससे कि तू स्वामिनी बनी हुई (विदथम्-आ वदासि) सुख अनुभव करनेयोग्य वचन को भली-भाँति बोले ॥२६॥

भावार्थ : विवाह हो चुकने पर पाणिग्रहणकर्ता पति वधू को सम्मान के साथ अच्छे यान में बिठाकर अपने घर ले जावे, वहाँ पहुँचकर वह गृहस्वामिनी बनकर पति के प्रति सुख पहुँचानेवाले वचन को बोले ॥२६॥