Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 86 / 3

किम॒यं त्वां वृ॒षाक॑पिश्च॒कार॒ हरि॑तो मृ॒गः । यस्मा॑ इर॒स्यसीदु॒ न्व१॒॑र्यो वा॑ पुष्टि॒मद्वसु॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 86 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वृषाकपिरैन्द्र इन्द्राणीन्द्रश्च | देवता : वरुणः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : किम् । अ॒यम् । त्वाम् । वृ॒षाक॑पिः । च॒कार॑ । हरि॑तः । मृ॒गः । यस्मै॑ । इ॒र॒स्यसि॑ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । नु । अ॒र्यः । वा॒ । पु॒ष्टि॒ऽमत् । वसु॑ । विश्व॑स्मात् । इन्द्रः॑ । उत्ऽत॑रः ॥ १०.८६.३

पदार्थ : इन्द्र की उक्ति−(अयम्-अर्यः) यह किरणों का स्वामी (वृषाकपिः-हरितः-मृगः) सूर्य मनोहर सुनहरे मृग ने (त्वां वा पुष्टिमत्-वसु) तेरे प्रति अथवा तेरे पुष्टियुक्त बहुमूल्य धन के प्रति (किं नु-चकार) क्या कर डाला-तेरी या तेरे धन की क्या हानि करी? (यस्मै-इरस्यसि-इत्-उ) जिस सूर्य के लिये तू इर्ष्या कर रही है ॥३॥

भावार्थ : यह आलङ्कारिक भाषा में कहा जा रहा है, व्योमकक्षा के प्रति या उसकी वस्तुओं के प्रति सूर्य कुछ बिगाड़ करता है, वह बिगाड़ अगले मन्त्र में बताया जा रहा है ॥३॥