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Rigveda / 1 / 187 / 7

यद॒दो पि॑तो॒ अज॑गन्वि॒वस्व॒ पर्व॑तानाम्। अत्रा॑ चिन्नो मधो पि॒तोऽरं॑ भ॒क्षाय॑ गम्याः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 187 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : ओषधयः | छन्द : भुरिगुष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : यत्। अ॒दः। पि॒तो॒ इति॑। अज॑गन्। वि॒वस्व॑। पर्व॑तानाम्। अत्र॑। चि॒त्। नः॒। म॒धो॒ इति॑। पि॒तो॒ इति॑। अर॑म्। भ॒क्षाय॑। ग॒म्याः॒ ॥ १.१८७.७

पदार्थ : हे (पितो) अन्नव्यापिन् पालकेश्वर ! (यत्) जिस (अदः) प्रत्यक्ष अन्न को विद्वान् जन (अजगन्) प्राप्त होते हैं उसमें (विवस्व) व्याप्तिमान् हूजिये। हे (मधो) मधुर (पितो) पालकान्नदाता ईश्वर ! (अत्र, चित्) इन (पर्वतानाम्) मेघों के बीच भी जो कि अन्न के निमित्त कहे हैं (नः) हमारे (भक्षाय) भक्षण करने के लिये अन्न को (अरम्) परिपूर्ण (गम्याः) प्राप्त कराइये ॥ ७ ॥

भावार्थ : सब पदार्थों में व्याप्त परमेश्वर को भक्षण आदि समय में स्मरण करे, जिस कारण जिस परमात्मा की कृपा से अन्नादि पदार्थ विविध प्रकार के पूर्वादि दिशा, देश और काल के अनुकूल वर्त्तमान हैं, उस परमात्मा ही का संस्मरण कर सब पदार्थ ग्रहण करने चाहियें ॥ ७ ॥