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Rigveda / 10 / 88 / 10

स्तोमे॑न॒ हि दि॒वि दे॒वासो॑ अ॒ग्निमजी॑जन॒ञ्छक्ति॑भी रोदसि॒प्राम् । तमू॑ अकृण्वन्त्रे॒धा भु॒वे कं स ओष॑धीः पचति वि॒श्वरू॑पाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 88 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : मूर्धन्वानाङ्गिरसो वामदेव्यो वा | देवता : सूर्यवैश्वानरौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : स्तोमे॑न । हि । दि॒वि । दे॒वासः॑ । अ॒ग्निम् । अजी॑जनन् । शक्ति॑ऽभिः । रो॒द॒सि॒ऽप्राम् । तम् । ऊँ॒ इति॑ । अ॒कृ॒ण्व॒न् । त्रे॒धा । भु॒वे । कम् । सः । ओष॑धीः । प॒च॒ति॒ । वि॒श्वऽरू॑पाः ॥ १०.८८.१०

पदार्थ : (देवासः) आरम्भसृष्टि में सर्वप्रथम सृष्टि के प्राण (दिवि) द्योतनात्मक ब्रह्माण्ड में (स्तोमेन) प्रतिधि द्वारा-परस्पर संघर्षण द्वारा (शक्तिभिः) कर्मों से (रोदसिप्राम्) द्युलोक पृथिवीमय जगत् को पूर्ण करनेवाले (अग्निम्-अजीजनन्) अग्निपदार्थ को उत्पन्न करते हैं (तं त्रेधा भुवे-अकृण्वन्) उसे तीन विभागों में कर दिया (कं सः सर्वरूपाः-ओषधीः पचति) वह अग्नि पदार्थ सब प्रकार की ओषधियों को पकाता है ॥१०॥

भावार्थ : सृष्टि के आरम्भ में सृष्टि प्राण-प्राणतत्त्व बहुसंख्या में प्रकट होते हैं, वे परस्पर संघर्ष करते हैं तो अग्नि पदार्थ उत्पन्न होता है, पुनः उस अग्नि पदार्थ को तीन रूपों में विभक्त करते हैं−सूर्य, विद्युत् और अग्निरूप में; ये तीनों समस्त तीनों लोकों में वर्तमान ओषधितत्त्वों को पकाते हैं, उपयुक्त बनाते हैं ॥१०॥