Rigveda / 10 / 89 / 10
इन्द्रो॑ दि॒व इन्द्र॑ ईशे पृथि॒व्या इन्द्रो॑ अ॒पामिन्द्र॒ इत्पर्व॑तानाम् । इन्द्रो॑ वृ॒धामिन्द्र॒ इन्मेधि॑राणा॒मिन्द्र॒: क्षेमे॒ योगे॒ हव्य॒ इन्द्र॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 89 | Mantra No : 10
In English:
Seer : reNuH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : indro diva indra iishe pRRithivyaa indro apaamindra itparvataanaam . indro vRRidhaamindra inmedhiraaNaamindraH kSheme yoge havya indraH .
Component Words : indraH . divaH . indraH . iishe . pRRithivyaaH . indraH . apaam . indraH . it . parvataanaam . indraH . vRRidhaam . indraH . it . medhiraaNaam . indraH . kSheme . yoge . havyaH . indraH . 10.89.10
In Hindi:
ऋषि : रेणुः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : इन्द्रः॑ । दि॒वः । इन्द्रः॑ । ई॒शे॒ । पृ॒थि॒व्याः । इन्द्रः॑ । अ॒पाम् । इन्द्रः॑ । इत् । पर्व॑तानाम् । इन्द्रः॑ । वृ॒धाम् । इन्द्रः॑ । इत् । मेधि॑राणाम् । इन्द्रः॑ । क्षेमे॑ । योगे॑ । हव्यः॑ । इन्द्रः॑ ॥ १०.८९.१०
पदार्थ : (इन्द्रः-दिवः) परमात्मा द्युलोक का (इन्द्रः पृथिव्याः) परमात्मा पृथिवीलोक का (इन्द्रः-अपाम्) परमात्मा अन्तरिक्ष का (इन्द्रः-इत् पर्वतानाम्) परमात्मा ही मेघों का (इन्द्रः-वृधाम्) परमात्मा आकार में वृद्ध बड़ों आकाश आदि तथा आयु में बड़ों का (इन्द्रः-इत्-मेधिराणाम्) परमात्मा मेधावी ऋषियों का (ईशे) स्वामित्व करता है-शासन करता है (इन्द्रः क्षेमे) परमात्मा प्राप्त के रक्षण में (इन्द्रः-योगे) परमात्मा अप्राप्त के योग-पाने में (हव्यः) ह्वान करने योग्य-आमन्त्रण करने योग्य उपास्य है ॥१०॥
भावार्थ : द्युलोक, पृथिवीलोक, अन्तरिक्ष तथा मेघों, महान् आकाश आदि पदार्थों, आयु में बड़ों, मेधावी ऋषियों का स्वामित्व करनेवाला है और हमारे द्वारा रक्षार्थ एवं प्राप्ति के लिये आमन्त्रण करने योग्य उपास्य है ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : रेणुः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : इन्द्रः॑ । दि॒वः । इन्द्रः॑ । ई॒शे॒ । पृ॒थि॒व्याः । इन्द्रः॑ । अ॒पाम् । इन्द्रः॑ । इत् । पर्व॑तानाम् । इन्द्रः॑ । वृ॒धाम् । इन्द्रः॑ । इत् । मेधि॑राणाम् । इन्द्रः॑ । क्षेमे॑ । योगे॑ । हव्यः॑ । इन्द्रः॑ ॥ १०.८९.१०
भावार्थ :