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Rigveda / 10 / 89 / 17

ए॒वा ते॑ व॒यमि॑न्द्र भुञ्जती॒नां वि॒द्याम॑ सुमती॒नां नवा॑नाम् । वि॒द्याम॒ वस्तो॒रव॑सा गृ॒णन्तो॑ वि॒श्वामि॑त्रा उ॒त त॑ इन्द्र नू॒नम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 89 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : रेणुः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ए॒व । ते॒ । व॒यम् । इ॒न्द्र॒ । भु॒ञ्ज॒ती॒नाम् । वि॒द्याम॑ । सु॒ऽम॒ती॒नाम् । नवा॑नाम् । वि॒द्याम॑ । वस्तोः॑ । अव॑सा । गृ॒णन्तः॑ । वि॒श्वामि॑त्राः । उ॒त । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । नू॒नम् ॥ १०.८९.१७

पदार्थ : (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (एव) ऐसे (वयं विश्वामित्राः) हम सब के मित्र (ते) तेरी  (भुञ्जतीनाम्) पालन करती हुई-रक्षा करती हुई (नवानां सुमतीनाम्) प्रशंसनीय कल्याणवाणियों-वेदवाणियों को (विद्याम) जानें (उत) और (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (ते-अवसा) तेरी रक्षा-कृपा से (वस्तोः) प्रतिदिन (नूनं गृणन्तः) अवश्य स्तुति करते हुए (विद्याम) हम तुझे प्राप्त करें ॥१७॥

भावार्थ : परमात्मा की दी हुई वेदवाणियाँ मनुष्यों के लिये रक्षा करनेवाली कल्याणकारिणी हैं, उसकी कृपा से उन्हें जानें तथा प्रतिदिन स्तुति करते हुए परमात्मा को प्राप्त करें ॥१७॥