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Rigveda / 1 / 188 / 2

तनू॑नपादृ॒तं य॒ते मध्वा॑ य॒ज्ञः सम॑ज्यते। दध॑त्सह॒स्रिणी॒रिष॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 188 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : आप्रियः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब अध्यापक के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : तनू॑ऽनपात्। ऋ॒तम्। य॒ते। मध्वा॑। य॒ज्ञः। सम्। अ॒ज्य॒ते॒। दध॑त्। स॒ह॒स्रिणीः॑। इषः॑ ॥ १.१८८.२

पदार्थ : जो (सहस्रिणीः) सहस्रों (इषः) अन्नादि पदार्थों को (दधत्) धारण करता हुआ (तनूनपात्) शरीरों को न गिराने न नाश करनेहारा अर्थात् पालनेवाला (यज्ञः) पदार्थों में संयुक्त करने योग्य अग्नि (ऋतम्) यज्ञ, सत्य व्यवहार और जलादि पदार्थ को (मध्वा) मधुरता आदि के साथ (यते) प्राप्त होते हुए जन के लिये (समज्यते) अच्छे प्रकार प्रकट होता है, उसको सब सिद्ध करें ॥ २ ॥

भावार्थ : जिस कर्म से अतुल धन-धान्य प्राप्त होते हैं, उसका अनुष्ठान आरम्भ मनुष्य निरन्तर करें ॥ २ ॥