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Rigveda / 10 / 93 / 10

ऐषु॑ द्यावापृथिवी धातं म॒हद॒स्मे वी॒रेषु॑ वि॒श्वच॑र्षणि॒ श्रव॑: । पृ॒क्षं वाज॑स्य सा॒तये॑ पृ॒क्षं रा॒योत तु॒र्वणे॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 93 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : तान्वः पार्थ्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : आ । ए॒षु॒ । द्या॒वा॒पृ॒थि॒वी॒ इति॑ । धा॒त॒म् । म॒हत् । अ॒स्मे इति॑ । वी॒रेषु॑ । वि॒श्वऽच॑र्षणि । श्रवः॑ । पृ॒क्षम् । वाज॑स्य । सा॒तये॑ । पृ॒क्षम् । रा॒या । उ॒त । तु॒र्वणे॑ ॥ १०.९३.१०

पदार्थ : (द्यावापृथिवी) हे माता पिता के समान स्त्री पुरुषों! (अस्मे) हमारे (एषु वीरेषु) इन पुत्रों में (महत् विश्वचर्षणि) महान् सर्वजनहित-सार्वजनिक (श्रवः-आधातम्) श्रवणीय-यशस्य ज्ञान धन को भली-भाँति धारण कराओ (वाजस्य) अध्यात्मबल के (सातये) सम्भजन सम्यक् प्राप्ति के लिए (पृक्षम्) सम्पर्क स्थापित करो (उत) और (राया) सब ऐश्वर्य से (तुर्वणे पृक्षम्) शत्रुओं के हिंसन के लिये सम्पर्क बनाओ ॥१०॥

भावार्थ : समाज और राष्ट्र के स्त्री पुरुष युवक जनों में सर्वजनहितकर ज्ञान को प्रसारित करें तथा बल की प्राप्ति के लिए अपना सम्पर्क स्थापित करें। धनैश्वर्य से शत्रु के नाशार्थ सहयोग सम्पर्क बनावें ॥१०॥