Rigveda / 10 / 94 / 6
उ॒ग्रा इ॑व प्र॒वह॑न्तः स॒माय॑मुः सा॒कं यु॒क्ता वृष॑णो॒ बिभ्र॑तो॒ धुर॑: । यच्छ्व॒सन्तो॑ जग्रसा॒ना अरा॑विषुः शृ॒ण्व ए॑षां प्रो॒थथो॒ अर्व॑तामिव ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 94 | Mantra No : 6
In English:
Seer : arbudaH kaadraveyaH sarpaH | Devta : graavaaNaH | Metre : jagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ugraa iva pravahantaH samaayamuH saaka.m yuktaa vRRiShaNo bibhrato dhuraH . yachChvasanto jagrasaanaa araaviShuH shRRiNva eShaa.m prothatho arvataamiva .
Component Words : ugraaH.aiva . pra.avahantaH . sam.aaayamuH . saakam . yuktaaH . vRRiShaNaH . bibhrataH . dhuraH . yad . shvasantaH . jagrasaanaaH . araaviShuH . shRRiNve . eShaam . prothathaH . arvataam.aiva . 10.94.6
In Hindi:
ऋषि : अर्बुदः काद्रवेयः सर्पः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : उ॒ग्राःऽइ॑व । प्र॒ऽवह॑न्तः । स॒म्ऽआय॑मुः । सा॒कम् । यु॒क्ताः । वृष॑णः । बिभ्र॑तः । धुरः॑ । यद् । श्व॒सन्तः॑ । ज॒ग्र॒सा॒नाः । अरा॑विषुः । शृ॒ण्वे । ए॒षा॒म् । प्रो॒थथः॑ । अर्व॑ताम्ऽइव ॥ १०.९४.६
पदार्थ : (साकं युक्ताः) साथ रथ में युक्त हुए (धुरः-बिभ्रतः) रथधुरा को धारण करते हुए (वृषणः) बलवान् (उग्राः) वेगशील (प्रवहन्तः-इव) प्रवहन करनेवाले घोड़ों के समान (समायमुः) ये विद्वान् मनुष्यसमाज को यथावत् नियमित करते हैं, अपने उपदेश के अनुसार चलाते हैं (यत्) जब (श्वसन्तः) आश्वासन देते हुए (जग्रसानाः) सुखभोग कराते हुए (अराविषुः) उस मानवसमाज को उपदेश देते हैं, तो (अर्वताम्) घोड़ों का (प्रोथथः-इव) हिनहिनाने शब्द के समान (एषां शृण्वे) इनका उपदेश सुना जाता है ॥६॥
भावार्थ : विद्वान् जन मानवसमाज का वहन करते हैं, जैसे अच्छे घोड़े रथ को वहन करते हैं, मानवसमाज को नियमित ठीक चलते देखकर वे प्रसन्न होते हुए उत्तमोत्तम उपदेश किया करते हैं, जैसे अच्छे चलते हुए रथ को देखकर घोड़े प्रसन्नता से हिनहिनाना शब्द करते हैं ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : अर्बुदः काद्रवेयः सर्पः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : उ॒ग्राःऽइ॑व । प्र॒ऽवह॑न्तः । स॒म्ऽआय॑मुः । सा॒कम् । यु॒क्ताः । वृष॑णः । बिभ्र॑तः । धुरः॑ । यद् । श्व॒सन्तः॑ । ज॒ग्र॒सा॒नाः । अरा॑विषुः । शृ॒ण्वे । ए॒षा॒म् । प्रो॒थथः॑ । अर्व॑ताम्ऽइव ॥ १०.९४.६
भावार्थ :