Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 94 / 14

सु॒ते अ॑ध्व॒रे अधि॒ वाच॑मक्र॒ता क्री॒ळयो॒ न मा॒तरं॑ तु॒दन्त॑: । वि षू मु॑ञ्चा सुषु॒वुषो॑ मनी॒षां वि व॑र्तन्ता॒मद्र॑य॒श्चाय॑मानाः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 94 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : अर्बुदः काद्रवेयः सर्पः | देवता : ग्रावाणः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : सु॒ते । अ॒ध्व॒रे । अधि॑ । वाच॑म् । अ॒क्र॒त॒ । आ । क्री॒ळयः॑ । न । मा॒तर॑म् । तु॒दन्तः॑ । वि । सु । मु॒ञ्च॒ । सु॒सु॒ऽवुषः॑ । म॒नी॒षाम् । वि । व॒र्त॒न्ता॒म् । अद्र॑यः । चाय॑मानाः ॥ १०.९४.१४

पदार्थ : (चायमानाः) पूजा के योग्य विद्वान् (अद्रयः) मन्त्रप्रवचनकर्त्ता महानुभाव (अध्वरे सुते-अधि) अहिंसक अध्यात्मयज्ञ सम्पन्न होने के निमित्त (वाचम्-अक्रत) परमात्मा की स्तुति करते हैं (क्रीळयः-न) क्रीड़ाशील शिशुओं-छोटे बच्चों की भाँति (मातरं तुदन्तः) दूध पीने के लिये माता को प्रेरित करते हुए (वि वर्त्तन्ताम्) परमात्मा को विशेषरूप से अपने अन्दर सेवन करते हैं (सुषुवुषः) वे परमात्मा के उपासक (मनीषाम्) जगदुत्पादक परमात्मा की स्तुति को (सु विमुञ्च) भली-भाँति समर्पित करते हैं ॥१४॥

भावार्थ : पूजनीय मन्त्रप्रवचन करनेवाले परमात्मा को स्तुति द्वारा प्रेरित करते हैं कि वह अपने आनन्दरस को उन्हें पान कराये, जैसा कि छोटे बच्चे दुग्धपान के लिए  माता को प्रेरित करते हैं। परमात्मा की स्तुति इसलिए भी करनी चाहिये कि परमात्मा को अपने अन्दर धारण कर लिया जावे ॥१४॥