Rigveda / 10 / 95 / 6
या सु॑जू॒र्णिः श्रेणि॑: सु॒म्नआ॑पिर्ह्र॒देच॑क्षु॒र्न ग्र॒न्थिनी॑ चर॒ण्युः । ता अ॒ञ्जयो॑ऽरु॒णयो॒ न स॑स्रुः श्रि॒ये गावो॒ न धे॒नवो॑ऽनवन्त ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 95 | Mantra No : 6
In English:
Seer : puruuravaa aiLaH | Devta : urvashii | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yaa sujuurNiH shreNiH sumnaaapirhradechakShurna granthinii charaNyuH . taa a~njayo.aruNayo na sasruH shriye gaavo na dhenavo.anavanta .
Component Words : yaa . su.ajuurNiH . shreNiH . sumne.aaapiH . hrade.achakShuH . na . granthinaaii . charaNyuH . taaH . a~njayaH . aruNayaH . na . sasruH . shriye . gaavaH . na . dhenavaH . anavanta . 10.95.6
In Hindi:
ऋषि : पुरूरवा ऐळः | देवता : उर्वशी | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : या । सु॒ऽजू॒र्णिः । श्रेणिः॑ । सु॒म्नेऽआ॑पिः । ह्र॒देऽच॑क्षुः । न । ग्र॒न्थिना॑ई । च॒र॒ण्युः । ताः । अ॒ञ्जयः॑ । अ॒रु॒णयः॑ । न । स॒स्रुः॒ । श्रि॒ये । गावः॑ । न । धे॒नवः॑ । अ॒न॒व॒न्त॒ ॥ १०.९५.६
पदार्थ : (या) जो पत्नी या प्रजा (सुजूर्णिः) अच्छी शीघ्रकारी (श्रेणिः) आश्रय देनेवाली (सुम्ने-आपिः) सुख में प्रेरित करनेवाली (ह्रदे चक्षुः) जलाशय में नेत्रवाली अर्थात् दृष्टिमती (न) और (ग्रन्थिनी) कार्य को ठीक प्रकार जोड़नेवाली (चरण्युः) यथावत् व्यवहार करनेवाली (ताः) वे ऐसी पत्नियाँ या प्रजाएँ (अञ्जयः) कमनीय (अरुणयः) सुदर्शनीय तेजस्विनियाँ (श्रिये) समृद्धि के लिए (सस्रुः) यत्नशील (धेनवः) दुग्ध देनेवाली (गावः-न) गौऔं के समान सुख देनेवाली (अनवन्त) अपने पति या राजा की प्रशंसा करती हैं ॥६॥
भावार्थ : पत्नी या प्रजा शीघ्र कार्य करनेवाली, आश्रय देनेवाली, सुख में प्रेरित करनेवाली, गम्भीर दृष्टिवाली, कार्यों की योजना बनानेवाली, व्यवहारकुशल, तेजस्वी, कमनीय, प्रसन्नमुख, समृद्धि में यत्नशील होनी चाहिये, वे दूध देनेवाली गौऔं के समान सुखदायी हैं, वे ही पति या राजा को प्रशंसित करती हैं ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : पुरूरवा ऐळः | देवता : उर्वशी | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : या । सु॒ऽजू॒र्णिः । श्रेणिः॑ । सु॒म्नेऽआ॑पिः । ह्र॒देऽच॑क्षुः । न । ग्र॒न्थिना॑ई । च॒र॒ण्युः । ताः । अ॒ञ्जयः॑ । अ॒रु॒णयः॑ । न । स॒स्रुः॒ । श्रि॒ये । गावः॑ । न । धे॒नवः॑ । अ॒न॒व॒न्त॒ ॥ १०.९५.६
भावार्थ :