Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 95 / 11

ज॒ज्ञि॒ष इ॒त्था गो॒पीथ्या॑य॒ हि द॒धाथ॒ तत्पु॑रूरवो म॒ ओज॑: । अशा॑सं त्वा वि॒दुषी॒ सस्मि॒न्नह॒न्न म॒ आशृ॑णो॒: किम॒भुग्व॑दासि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 95 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : उर्वशी | देवता : पुरुरवा ऐळः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ज॒ज्ञि॒षे । इ॒त्था । गो॒ऽपीथ्या॑य । हि । द॒धाथ॑ । तत् । पु॒रू॒र॒वः॒ । मे॒ । ओजः॑ । अशा॑सम् । त्वा॒ । वि॒दुषी॑ । सस्मि॑न् । अह॑न् । न । मे॒ । आ । अ॒शृ॒णोः॒ । किम् । अ॒भुक् । व॒दा॒सि॒ ॥ १०.९५.११

पदार्थ : यहाँ से केवल गृहस्थ विषय है, (पुरूरवः) हे बहुत शुभ बोलनेवाले ! (इत्था) सत्य तू (गोपीथ्याय हि जज्ञिषे) गृहस्थ रसपान के लिये अवश्य समर्थ है (मे-ओजः-दधाथ) मेरे में पुत्रोत्पत्तिविषयक सामर्थ्य-वीर्य को धारण कराता है (विदुषी त्वा-अशासम्) मैं विदुषी होती हुई तुझे कहती हूँ (सस्मिन्-अहन्) सब दिन में-सारे दिन में (मे न-अशृणोः) मेरे लिये नहीं सुनता है-स्वीकारता है (किम्-अभुक्-वदासि) क्या तू अभोक्ता हुआ या अरक्षक हुआ बोलता है ॥११॥

भावार्थ : सच्ची सदाचारिणी पत्नी पति को गृहस्थ जीवन की मर्यादा बतावे-सुझावे कि गृहस्थ आश्रम केवल भोग का आश्रम नहीं है, सन्तानोत्पत्ति के लिये है, केवल कामवासना पूरी करने के पीछे न पड़ना चाहिये। ठीक है, पति भोग का भूखा है, परन्तु पुत्र का इच्छुक होने से कामवासना दुःख का निमित्त नहीं, केवल कामवासना दुःखदायक है ॥११॥