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Rigveda / 1 / 188 / 9

त्वष्टा॑ रू॒पाणि॒ हि प्र॒भुः प॒शून्विश्वा॑न्त्समान॒जे। तेषां॑ नः स्फा॒तिमा य॑ज ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 188 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : आप्रियः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब ईश्वर विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : त्वष्टा॑। रू॒पाणि॑। हि। प्र॒ऽभुः। प॒शून्। विश्वा॑न्। स॒म्ऽआ॒न॒जे। तेषा॑म्। नः॒ स्फा॒तिम्। आ। य॒ज॒ ॥ १.१८८.९

पदार्थ : हे विद्वान् ! जैसे (त्वष्टा) सब जगत् का निर्माण करनेवाला (प्रभुः) समर्थ ईश्वर (हि) ही (विश्वान्) समस्त (पशुन्) गवादि पशुओं और (रूपाणि) समस्त विविध प्रकार से स्थूल वस्तुओं को (समानजे) अच्छे प्रकार प्रकट करता और (तेषाम्) उनकी (स्फातिम्) वृद्धि को प्रकट करता है वैसे आप (नः) हमारी वृद्धि को (आ, यज) अच्छे प्रकार प्राप्त कीजिये ॥ ९ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे जगदीश्वर ने इन्द्रियों से परे जो अतिसूक्ष्म कारण है उससे चित्र-विचित्र सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी, ओषधि और मनुष्य के शरीरावयवादि वस्तु बनाई हैं, वैसे इस सृष्टि के गुण, कर्म और स्वभाव क्रम से अनेक व्यवहार सिद्ध करनेवाली वस्तुयें बनानी चाहियें ॥ ९ ॥