Rigveda / 10 / 96 / 4
दि॒वि न के॒तुरधि॑ धायि हर्य॒तो वि॒व्यच॒द्वज्रो॒ हरि॑तो॒ न रंह्या॑ । तु॒ददहिं॒ हरि॑शिप्रो॒ य आ॑य॒सः स॒हस्र॑शोका अभवद्धरिम्भ॒रः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 96 | Mantra No : 4
In English:
Seer : baruH sarvaharirvaindraH | Devta : haristutiH | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : divi na keturadhi dhaayi haryato vivyachadvajro harito na ra.mhyaa . tudadahi.m harishipro ya aayasaH sahasrashokaa abhavaddharimbharaH .
Component Words : divi . na . ketuH . adhi . dhaayi . haryataH . vivyachat . vajraH . haritaH . na . ra.mhyaa . tudat . ahim . hari.ashipraH . yaH . aayasaH . sahasra.ashokaaH . abhavat . harim.abharaH . 10.96.4
In Hindi:
ऋषि : बरुः सर्वहरिर्वैन्द्रः | देवता : हरिस्तुतिः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : दि॒वि । न । के॒तुः । अधि॑ । धा॒यि॒ । ह॒र्य॒तः । वि॒व्यच॑त् । वज्रः॑ । हरि॑तः । न । रंह्या॑ । तु॒दत् । अहि॑म् । हरि॑ऽशिप्रः । यः । आ॒य॒सः । स॒हस्र॑ऽशोकाः । अ॒भ॒व॒त् । ह॒रि॒म्ऽभ॒रः ॥ १०.९६.४
पदार्थ : (हर्यतः) कमनीय परमात्मा (दिवि केतुः-न) आकाश में सूर्य जैसा स्तुतिकर्त्ताओं के द्वारा (अधि धायि) अपने आत्मा में अधिष्ठित किया (वज्रः) उस परमात्मा का ओज (विव्यचत्) जगत् में व्यापता है (रंह्या) वेगपूर्ण गति से (हरितः-न) रश्मियाँ जैसे सर्वत्र व्याप जाती हैं। (यः) जो परमात्मा (हरिशिप्रः) मनोहर स्वरूपवाला (आयसः) समन्त प्रयत्नशील (सहस्रशोकाः) बहुत तेजस्वी (हरिम्भरः) दुःखहरण गुणधारक (अभवत्) है ॥४॥
भावार्थ : परमात्मा कमनीय है, उसे उपासक अपने आत्मा में सूर्य के समान साक्षात् करते हैं, वह मनोहर स्वरूपवाला बहुत तेजस्वी दुःख हरनेवाले गुणों से पूर्ण है, अनन्त प्रयत्नवान् है, उसका ओज जगत् में व्याप्त हो रहा है ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : बरुः सर्वहरिर्वैन्द्रः | देवता : हरिस्तुतिः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : दि॒वि । न । के॒तुः । अधि॑ । धा॒यि॒ । ह॒र्य॒तः । वि॒व्यच॑त् । वज्रः॑ । हरि॑तः । न । रंह्या॑ । तु॒दत् । अहि॑म् । हरि॑ऽशिप्रः । यः । आ॒य॒सः । स॒हस्र॑ऽशोकाः । अ॒भ॒व॒त् । ह॒रि॒म्ऽभ॒रः ॥ १०.९६.४
भावार्थ :