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Rigveda / 10 / 96 / 8

हरि॑श्मशारु॒र्हरि॑केश आय॒सस्तु॑र॒स्पेये॒ यो ह॑रि॒पा अव॑र्धत । अर्व॑द्भि॒र्यो हरि॑भिर्वा॒जिनी॑वसु॒रति॒ विश्वा॑ दुरि॒ता पारि॑ष॒द्धरी॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 96 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : बरुः सर्वहरिर्वैन्द्रः | देवता : हरिस्तुतिः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : हरि॑ऽश्मशारुः । हरि॑ऽकेशः । आ॒य॒सः । तु॒रः॒ऽपेये॑ । यः । ह॒रि॒ऽपाः । अव॑र्धत । अर्व॑त्ऽभिः । यः । हरि॑ऽभिः । वा॒जिनी॑ऽवसुः । अति॑ । विश्वा॑ । दुः॒ऽइ॒ता । पारि॑षत् । हरी॒ इति॑ ॥ १०.९६.८

पदार्थ : (हरिश्मशारुः) अज्ञानहरणशीलप्रमुख ज्ञान उपदेश वेदवाला (हरिकेशः) दुःखहरणकारक प्रकाशवाला (आयसः) तेज का पुञ्ज-तेजस्वी (तुरस्पेये) उपासना रस-के पान प्रसङ्ग में शीघ्रकारी (यः) जो (हरिपाः) मनोहर उपासना रस के पान करनेवाले (अवर्धत) उपासक आत्मा के अन्दर बढ़ता है-साक्षात् होता है (वाजिनीवसुः) उषा के समान ज्ञानदीप्ति का बसानेवाला है (अर्वद्भिः) गतिवालों (हरिभिः) दुःखहरणशीलवालों के द्वारा (हरी) सुनने सुनानेवाले (विश्वा) सब (दुरिता) दुःखों को (अति पारिषत्) अतिक्रमण कर जाते हैं ॥८॥

भावार्थ : परमात्मा अज्ञाननाशक प्रमुख ज्ञानभण्डार वेदवाला दुःखनाशक ज्ञानप्रकाशवाला तेजस्वी उपासनाप्रसङ्ग में शीघ्रकारी उपासना करनेवालों के अन्दर साक्षात् होता है, ज्ञानदीप्ति का प्रकाश करता है, उसके उपदेश को सुनने-सुनानेवालों को दुःख से पार कर देता है ॥८॥