Rigveda / 10 / 98 / 9
त्वां पूर्व॒ ऋष॑यो गी॒र्भिरा॑य॒न्त्वाम॑ध्व॒रेषु॑ पुरुहूत॒ विश्वे॑ । स॒हस्रा॒ण्यधि॑रथान्य॒स्मे आ नो॑ य॒ज्ञं रो॑हिद॒श्वोप॑ याहि ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 98 | Mantra No : 9
In English:
Seer : devaapiraarShTiSheNaH | Devta : devaaH | Metre : paadanichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : tvaa.m puurva RRIShayo giirbhiraayantvaamadhvareShu puruhuuta vishve . sahasraaNyadhirathaanyasme aa no yaj~na.m rohidashvopa yaahi .
Component Words : tvaam . puurve . RRIShayaH . giiH.abhiH . aayan . tvaam . adhvareShu . puru.ahuuta . vishve . sahasraaNi . adhi.arathaani . asme iti . aa . naH . yaj~nam . rihit.aashvaa . upa . yaahi . 10.98.9
In Hindi:
ऋषि : देवापिरार्ष्टिषेणः | देवता : देवाः | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : त्वाम् । पूर्वे॑ । ऋष॑यः । गीः॒ऽभिः । आ॒य॒न् । त्वाम् । अ॒ध्व॒रेषु॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । विश्वे॑ । स॒हस्रा॑णि । अधि॑ऽरथानि । अ॒स्मे इति॑ । आ । नः॒ । य॒ज्ञम् । रि॒हि॒त्ऽअ॒श्वा । उप॑ । या॒हि॒ ॥ १०.९८.९
पदार्थ : (पुरुहूत) हे बहुत प्रकार से आमन्त्रण करने योग्य (रोहिदश्व) तेजोधर्म से व्याप्त परमात्मन् ! (त्वाम्) तुझे (पूर्वे) पुरातन (ऋषयः) वैदिक ऋषि परमर्षि (गीर्भिः) स्तुतियों से (आयन्) प्राप्त हुए हैं (विश्वे) अन्य सब विद्वान् (अध्वरेषु) भिन्न-भिन्न यज्ञों में आमन्त्रित करते हैं (अस्मे) हमारे लिए (सहस्राणि) बहुत (अधिरथानि) रमणीय मोक्षसम्बन्धी धनसाधनों को प्रदान कर (नः) हमारे (यज्ञम्) श्रेष्ठतम कर्म के प्रति (उप-आ-याहि) प्राप्त हो, उसे उपयोगी बना ॥९॥
भावार्थ : पुरातन वैदिक महर्षियों ने इसकी स्तुतियों के द्वारा उसे तथा उसके वेदज्ञान को प्राप्त किया, अन्य अर्वाचीन सब ऋषि भी भिन्न-भिन्न यज्ञों में उसे आमन्त्रित करते हैं, वह मोक्षसम्बन्धी रमणीय भोगों को प्रदान करता है ॥९॥
In Sanskrit:
ऋषि : देवापिरार्ष्टिषेणः | देवता : देवाः | छन्द : पादनिचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : त्वाम् । पूर्वे॑ । ऋष॑यः । गीः॒ऽभिः । आ॒य॒न् । त्वाम् । अ॒ध्व॒रेषु॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । विश्वे॑ । स॒हस्रा॑णि । अधि॑ऽरथानि । अ॒स्मे इति॑ । आ । नः॒ । य॒ज्ञम् । रि॒हि॒त्ऽअ॒श्वा । उप॑ । या॒हि॒ ॥ १०.९८.९
भावार्थ :