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Rigveda / 10 / 100 / 8

अपामी॑वां सवि॒ता सा॑विष॒न्न्य१॒॑ग्वरी॑य॒ इदप॑ सेध॒न्त्वद्र॑यः । ग्रावा॒ यत्र॑ मधु॒षुदु॒च्यते॑ बृ॒हदा स॒र्वता॑ति॒मदि॑तिं वृणीमहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 100 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : दुवस्युर्वान्दनः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अप॑ । अमी॑वाम् । स॒वि॒ता । सा॒वि॒ष॒त् । न्य॑क् । वरी॑यः । इत् । अप॑ । से॒ध॒न्तु॒ । अद्र॑यः । ग्रावा॑ । यत्र॑ म॒धु॒ऽसुत् । उ॒च्यते॑ । बृ॒हत् । आ । स॒र्वऽता॑तिम् । अदि॑तिम् । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥ १०.१००.८

पदार्थ : (सविता) उत्पादक परमात्मा (अमीवाम्) रोग को (अपसाविषत्) पृथक् करता है (अद्रयः) उपदेश करनेवाले (वरीयः-इत्) बढ़े-चढ़े पाप को भी (न्यक्) नीचे करते हैं (यत्र) जिसके आश्रय में (मधुषुत्) मधुर उपासनारस का निष्पादक (ग्रावा) विद्वान् (उच्यते) कहा जाता है (बृहत्) प्रशस्त महान् उस (सर्वतातिम्०) पूर्ववत् ॥८॥

भावार्थ : उत्पन्न करनेवाला परमात्मा रोग को अलग करता है, ओषधियों को उत्पन्न करके उपदेशक जन अन्दर से बढ़े-चढ़े पाप को निकालते हैं, परमात्मा की उपासना करनेवाला विद्वान् कहलाता है, उस महान् जगद्विस्तारक अविनाशी परमात्मा को मानना अपनाना चाहिए ॥८॥