Rigveda / 10 / 102 / 10
आ॒रे अ॒घा को न्वि१॒॑त्था द॑दर्श॒ यं यु॒ञ्जन्ति॒ तम्वा स्था॑पयन्ति । नास्मै॒ तृणं॒ नोद॒कमा भ॑र॒न्त्युत्त॑रो धु॒रो व॑हति प्र॒देदि॑शत् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 102 | Mantra No : 10
In English:
Seer : mudgalo bhaarmyashvaH | Devta : drughaNa indro vaa | Metre : viraaTtriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : aare aghaa ko nvi1tthaa dadarsha ya.m yu~njanti tamvaa sthaapayanti . naasmai tRRiNa.m nodakamaa bharantyuttaro dhuro vahati pradedishat .
Component Words : aare . aghaa . kaH . nu . itthaa . dadarsha . yam . yu~njanti . tam . uu.N iti . aa . sthaapayanti . na . asmai . tRRiNam . na . udakam . aa . bharanti . ut.ataraH . dhuraH . vahati . pra.adedishat . 10.102.10
In Hindi:
ऋषि : मुद्गलो भार्म्यश्वः | देवता : द्रुघण इन्द्रो वा | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : आ॒रे । अ॒घा । कः । नु । इ॒त्था । द॒द॒र्श॒ । यम् । यु॒ञ्जन्ति॑ । तम् । ऊँ॒ इति॑ । आ । स्था॒प॒य॒न्ति॒ । न । अ॒स्मै॒ । तृण॑म् । न । उ॒द॒कम् । आ । भ॒र॒न्ति॒ । उत्ऽत॑रः । धु॒रः । व॒ह॒ति॒ । प्र॒ऽदेदि॑शत् ॥ १०.१०२.१०
पदार्थ : (अघा) आश्चर्य है (आरे) अरे ! (कः-नु) किसने ही (इत्था ददर्श) ऐसा देखा है कि (यम्-उ) जिस ही काष्ठादिमय वृषभ को (युञ्जन्ति) जोड़ते हैं (तम्-उ) उस पर ही (आ स्थापयन्ति) अपने और दूसरों को बिठाते हैं, वह ही वृषभ है और वही यान है, यह आश्चर्य है (अस्मै) इसके लिए (न तृणम्) न घास (न-उदकम्) और न ही जल (आभरन्ति) समर्पित करते हैं-देते हैं (प्रदेदिशत्) सङ्केत को प्राप्त हुआ (उत्तरः) उछला हुआ (धुरः) धुराओं को (वहति) चलाता है ॥१०॥
भावार्थ : ऐसा वृषभ आकृतिवाला यान बनाया जाना चाहिये, जिसको देखकर आश्चर्य होता हो, वही जुड़ने का काम करता है, वही यान का काम करता है, उसमें ही बैठा जाता है, उसे अन्य वृषभों की भाँति न घास दिया जाता है खाने को, न पानी दिया जाता है पीने को, किन्तु सङ्केत या प्रेरणा के अनुसार ऊपर उछलता है, यान की धुराओं को चला देता है, चला कर ऊपर ले जाता है ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : मुद्गलो भार्म्यश्वः | देवता : द्रुघण इन्द्रो वा | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : आ॒रे । अ॒घा । कः । नु । इ॒त्था । द॒द॒र्श॒ । यम् । यु॒ञ्जन्ति॑ । तम् । ऊँ॒ इति॑ । आ । स्था॒प॒य॒न्ति॒ । न । अ॒स्मै॒ । तृण॑म् । न । उ॒द॒कम् । आ । भ॒र॒न्ति॒ । उत्ऽत॑रः । धु॒रः । व॒ह॒ति॒ । प्र॒ऽदेदि॑शत् ॥ १०.१०२.१०
भावार्थ :