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Rigveda / 10 / 103 / 8

इन्द्र॑ आसां ने॒ता बृह॒स्पति॒र्दक्षि॑णा य॒ज्ञः पु॒र ए॑तु॒ सोम॑: । दे॒व॒से॒नाना॑मभिभञ्जती॒नां जय॑न्तीनां म॒रुतो॑ य॒न्त्वग्र॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 103 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : अप्रतिरथ ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : इन्द्रः॑ । आ॒सा॒म् । ने॒ता । बृह॒स्पतिः॑ । दक्षि॑णा । य॒ज्ञः । पु॒रः । ए॒तु॒ । सोमः॑ । दे॒व॒ऽसे॒नाना॑म् । अ॒भि॒ऽभ॒ञ्ज॒ती॒नाम् । जय॑न्तीनाम् । म॒रुतः॑ । य॒न्तु॒ । अग्र॑म् ॥ १०.१०३.८

पदार्थ : (आसाम्) इन (देवसेनानाम्) विजय चाहनेवाली सेनाओं (अभिभञ्जतीनाम्) शत्रुओं का भञ्जन करती हुई (जयन्तीनाम्) जय प्राप्त करती हुई का (नेता) नायक, विद्युत्शक्तिसम्पन्न वीर राजा (बृहस्पतिः) विद्वान् सेनापति (दक्षिणा यज्ञः) दक्षिण भाग में यज्ञ-जिसके है, ऐसा यज्ञपरायण परोपकारी (सोमः) शान्तस्वभाव सेनाप्रेरक के अधीन (मरुतः) सैनिक जन (अग्रम्) आगे (यन्तु) जाते हैं, बढ़ते हैं ॥८॥

भावार्थ : जिस राष्ट्र में विजय चाहनेवाली, शत्रु का विभञ्जन करनेवाली, जय प्राप्त करने की शक्तिवाली सेनाएँ हों और उसका नेता शासक या सेनापति विद्युत्शक्ति जैसा वीर विद्वान् परोपकारी शान्तस्वभाव हो, तो सैनिक जन युद्ध में आगे बढ़ते चले जाते हैं और अन्त में युद्ध में विजय पाते हैं ॥८॥