Rigveda / 10 / 104 / 10
वी॒रेण्य॒: क्रतु॒रिन्द्र॑: सुश॒स्तिरु॒तापि॒ धेना॑ पुरुहू॒तमी॑ट्टे । आर्द॑यद्वृ॒त्रमकृ॑णोदु लो॒कं स॑सा॒हे श॒क्रः पृत॑ना अभि॒ष्टिः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 104 | Mantra No : 10
In English:
Seer : aShTako vaishvaamitraH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : viireNyaH kraturindraH sushastirutaapi dhenaa puruhuutamiiTTe . aardayadvRRitramakRRiNodu loka.m sasaahe shakraH pRRitanaa abhiShTiH .
Component Words : viireNyaH . kratuH . indraH . su.ashastiH . uta . api . dhenaa . puru.ahuutam . iiTTe . aardayat . vRRitram . akRRiNot . uu.N iti . lokam . sasahe . shakraH . pRRitanaaH . abhiShTiH . 10.104.10
In Hindi:
ऋषि : अष्टको वैश्वामित्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : वी॒रेण्यः॑ । क्रतुः॑ । इन्द्रः॑ । सु॒ऽश॒स्तिः । उ॒त । अपि॑ । धेना॑ । पु॒रु॒ऽहू॒तम् । ई॒ट्टे॒ । आर्द॑यत् । वृ॒त्रम् । अकृ॑णोत् । ऊँ॒ इति॑ । लोक॑म् । स॒स॒हे । श॒क्रः । पृत॑नाः । अ॒भि॒ष्टिः ॥ १०.१०४.१०
पदार्थ : (इन्द्रः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (वीरेण्यः) प्राणों के लिये हितकर-प्राणपोषक (क्रतुः) कर्मवान् (सुशस्तिः) शोभन प्रशंसावाला-सुप्रशंसनीय (उत-अपि) और (पुरुहूतम्) इस बहुत प्रकार से बुलाने योग्य परमात्मा को (धेना) वेदवाणी (ईट्टे) स्तुति करती है-वर्णन करती है (वृत्रम्-आर्दयत्) आवरणकारक अज्ञान को वेदवाणी से भलीभाँति नष्ट करता है (लोकम्-अकृणोत्) ज्ञान का प्रकाश करता है (शक्रः) समर्थ परमात्मा (अभिष्टिः) अभिव्याप्त होता हुआ (पृतनाः) संग्रामप्रवृत्तियों को (ससहे) स्वाधीन करता है ॥१०॥
भावार्थ : परमात्मा प्राणपोषक सर्वकर्मसमर्थ है, उसके स्वरूप को वेदवाणी वर्णन करती है, वह अज्ञाननाशक और ज्ञानप्रकाशक और विरोधी प्रवृत्तियों पर अधिकार करनेवाला है ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : अष्टको वैश्वामित्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : वी॒रेण्यः॑ । क्रतुः॑ । इन्द्रः॑ । सु॒ऽश॒स्तिः । उ॒त । अपि॑ । धेना॑ । पु॒रु॒ऽहू॒तम् । ई॒ट्टे॒ । आर्द॑यत् । वृ॒त्रम् । अकृ॑णोत् । ऊँ॒ इति॑ । लोक॑म् । स॒स॒हे । श॒क्रः । पृत॑नाः । अ॒भि॒ष्टिः ॥ १०.१०४.१०
भावार्थ :