Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 107 / 2

उ॒च्चा दि॒वि दक्षि॑णावन्तो अस्थु॒र्ये अ॑श्व॒दाः स॒ह ते सूर्ये॑ण । हि॒र॒ण्य॒दा अ॑मृत॒त्वं भ॑जन्ते वासो॒दाः सो॑म॒ प्र ति॑रन्त॒ आयु॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 107 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : दिव्यो दक्षिणा वा प्राजापत्या | देवता : दक्षिणा तद्दातारों वा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : उ॒च्चा । दि॒वि । दक्षि॑णाऽवन्तः । अ॒स्थुः॒ । ये । अ॒श्व॒ऽदाः । स॒ह । ते । सूर्ये॑ण । हि॒र॒ण्य॒ऽदाः । अ॒मृत॒ऽत्वम् । भ॒ज॒न्ते॒ । वा॒सः॒ऽदाः । सो॒म॒ । प्र । ति॒र॒न्ते॒ । आयुः॑ ॥ १०.१०७.२

पदार्थ : (दक्षिणावन्तः) दक्षिणा देनेवाले (दिवि) निर्मल ज्ञान से अपनी आत्मा को (उच्चा-अस्थुः) ऊँचा उठाते हैं (ये अश्वदाः) उनमें जो मार्गव्यापी-यात्रा के साधनों को देनेवाले (ते सूर्येण सह) प्रेरक परमात्मा के साथ बैठतें हैं-उसकी प्रेरणा पाते हैं (हिरण्यदाः) ज्ञानामृत के प्रदान करनेवाले (अमृतं भजन्ते) मोक्ष पद को प्राप्त होते हैं (सोम वासोदाः) सोम्य पात्र-दानशीलजन आश्रय देनेवाले-शरण देनेवाले (आयुः-प्रतिरन्ते) अपना और अन्यों के जीवन को बढ़ाते हैं ॥२॥

भावार्थ : दक्षिणा देनेवालों का आत्मा ऊँचा हो जाता है, यात्रा के साधनों को देनेवाले परमात्मा की प्रेरणा पाते हैं, ज्ञानामृत के प्रदान करनेवाले मोक्षप्रद को प्राप्त होते हैं, वस्त्र मकान शरण देनेवाले अपना और अन्यों के जीवन को बढाते हैं ॥२॥