Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 1 / 190 / 5

ये त्वा॑ देवोस्रि॒कं मन्य॑मानाः पा॒पा भ॒द्रमु॑प॒जीव॑न्ति प॒ज्राः। न दू॒ढ्ये॒३॒॑ अनु॑ ददासि वा॒मं बृह॑स्पते॒ चय॑स॒ इत्पिया॑रुम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 190 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : बृहस्पतिः | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : ये। त्वा॒। दे॒व॒। उ॒स्रि॒कम्। मन्य॑मानाः। पा॒पाः। भ॒द्रम्। उ॒प॒ऽजीव॑न्ति। प॒ज्राः। न। दुः॒ऽध्ये॑। अनु॑। द॒दा॒सि॒। वा॒मम्। बृह॑स्पते। चय॑से। इत्। पिया॑रुम् ॥ १.१९०.५

पदार्थ : हे (देव) विद्वान् ! (ये) जो (मन्यमानाः) विज्ञानवान् (पापाः) अधर्माचारी (पज्राः) प्राप्त हुए जन (उस्रिकम्) गौओं के साथ विचरते उन (भद्रम्) कल्याणरूपी (त्वा) आपके (उप, जीवन्ति) समीप जीवित हैं वे आपकी शिक्षा पाने योग्य हैं। हे (बृहस्पते) बड़े विद्वानों की पालना करनेवाले जो आप (ढूढ्ये) दुष्ट—बुरा विचार करनेवाले को (न, अनु, ददासि) अनुक्रम से सुख नहीं देते (वामम्) प्रशंसित (पियारुम्) पान की इच्छा करनेवाले को (इत्) ही (चयसे) प्राप्त होते वे आप सभों को उपदेश देओ ॥ ५ ॥

भावार्थ : जो विद्वान् जन अपने निकटवर्त्ती अज्ञ, अभिमानी, पापी जनों को उपदेश दे धार्मिक करते हैं, वे कल्याण को प्राप्त होते हैं ॥ ५ ॥