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Rigveda / 10 / 108 / 1

किमि॒च्छन्ती॑ स॒रमा॒ प्रेदमा॑नड्दू॒रे ह्यध्वा॒ जगु॑रिः परा॒चैः । कास्मेहि॑ति॒: का परि॑तक्म्यासीत्क॒थं र॒साया॑ अतर॒: पयां॑सि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 108 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : पणयोऽ सुराः | देवता : सरमा | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : इस सूक्त में सरमा विद्युत्-गर्जना मेघों से जलों को निकाल बाहिर गिराती है। अध्यात्मदृष्टि से सरमा चेतना का एक देह से दूसरे देह में जाना इन्द्रियों से मुक्त होकर मोक्षप्राप्ति और उसके उपाय कहे हैं।

पदपाठ : किम् । इ॒च्छन्ती॑ । स॒रमा॑ । प्र । इ॒दम् । आ॒न॒ट् । दू॒रे । हि । अध्वा॑ । जगु॑रिः । प॒रा॒चैः । का । अ॒स्मेऽहि॑तिः । का । परि॑ऽतक्म्या । आ॒सी॒त् । क॒थम् । र॒सायाः॑ । अ॒त॒रः॒ । पयां॑सि ॥ १०.१०८.१

पदार्थ : वक्तव्यम्−इस सूक्त में निरुक्त के अनुसार आलङ्कारिक चर्चा है। यहाँ “सरमा” माध्यमिका वाक् मेघ के अन्दर स्तनयित्नु नाम की गर्जना है, वृष्टिविज्ञान आलङ्कारिकरूप में प्रदर्शित किया है। (सरमा) स्तनयित्नु वाक्-मेघ की गर्जना (किम्-इच्छन्ती) क्या अन्वेषण करती हुई खोजती हुई (इदं प्र-आनट्) इस स्थान को प्राप्त हुई (दूरे हि-अध्वा) दूर ही मार्ग है (पराचैः) पराञ्चनों-ज्ञानप्रकाश से विमुखों के द्वारा ये मार्ग अचित्-अलक्षित है, अतः (जगुरिः) कोई ही भलीभाँति जानेवाला इस मार्ग में जाने को समर्थ है (अस्मे) हमारे निमित्त (का हितिः) क्या अर्थहिति-अर्थभावना है (का परितक्म्या-आसीत्) कैसी रात्रि आश्रयरूप है (कथं रसायाः) कैसे अन्तरिक्षवाली नदी के (पयांसि-अतरः) जलों को पार किया-करती है ॥१॥ विवरण−मेघों में वृष्टि से पूर्व विद्युत् के चमकने से स्तनयित्नु-गर्जना सरकती हुई प्रवृत्त होती है, वह ही यहाँ अलङ्कार में सरमा कही है, मेघधारा-नदी उसके पार जाना ही सरण-उसका सरकना है, मेघों के कृष्ण वर्णवाले होने से कृष्ण आकृति ही रात्रि है। 

भावार्थ : वैज्ञानिक वृष्टिविज्ञान के वेत्ता को विचार करना चाहिए कि मेघ के अन्दर गर्जना मेघधारा के-जलों को पार करती हुई चली जाती है। इसका लक्ष्य क्या है? यह गर्जना क्यों होती है? इसमें मानवों का हित क्या है? ॥१॥आध्यात्मिकयोजना−एक देह से दूसरे देह में सरणशील-गमनशील चेतना-चेतनाशक्ति आत्मा कुछ चाहती हुई-मोक्ष चाहती हुई-शरीर में प्राप्त हुई, उसका मार्ग विषयभोगों से दूर है। शरीर में प्राणों का हित क्या है? चेतना के प्राप्त होने पर माता के रस रक्त नदी को पार करके प्रकट हुई गर्भाशय को पार करके बाहर आई है ॥१॥