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Rigveda / 10 / 110 / 6

आ सु॒ष्वय॑न्ती यज॒ते उपा॑के उ॒षासा॒नक्ता॑ सदतां॒ नि योनौ॑ । दि॒व्ये योष॑णे बृह॒ती सु॑रु॒क्मे अधि॒ श्रियं॑ शुक्र॒पिशं॒ दधा॑ने ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 110 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : जम्दग्नी रामो वा | देवता : आप्रियः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : आ । सु॒स्वय॑न्ती॒ इति॑ । य॒ज॒ते इति॑ । उपा॑के॒ इति॑ । उ॒षसा॒नक्ता॑ । स॒द॒ता॒म् । नि । योनौ॑ । दि॒व्ये । योष॑णे॒ इति॑ । बृ॒ह॒ती इति॑ । सु॒रु॒क्मे इति॑ सु॒ऽरु॒क्मे । अधि॑ । श्रिय॑म् । शु॒क्र॒ऽपिश॑म् । दधा॑ने ॥ १०.११०.६

पदार्थ : (आ सुष्वयन्ती) पुनः-पुनः कुछ हँसती हुई या सुलाती हुई (यजते) यजनयोग्य (उपाके) परस्पर उपगत-सापेक्ष (दिव्ये योषणे) दिव्य मिश्रण स्वभाववाले (बृहती) दो बड़े भारी (सुरुक्मे) सुरोचन-मधुर रुचिवाले (शुक्रपिशम्-अधि दधाने) शुभ्रवर्णवाली लक्ष्मी को धारण करती हुई (उषासानक्ता) प्रातः और सायं होनेवाले अग्नि देवताओं (योनौ) यज्ञगृह-कुण्ड में (आसदताम्) स्थिर होवो ॥६॥ अध्यात्मदृष्टि से−ध्यानयज्ञ में परमात्मा के आश्रय प्रातः-सायं प्राप्त होनेवाले कुछ हँसते हुए से या अच्छा सुलाते हुए उपासक को प्राप्त होते हो, ये सङ्गमनीय हैं तथा परस्पर सङ्गत दिव्य मिश्रण धर्मवाले शुभ्र शोभा को धारण करते हुए अच्छे रोचमान हुए उपासक के साथ मिश्रण धर्म रखते हुए हो ॥६॥

भावार्थ : यज्ञकुण्ड में प्रातः-सायं प्रयुक्त हुई दो अग्नियाँ कुछ हँसती हुई-जागृति देती हुई तथा सुलाती हुई सी अच्छी रोचमान गृहलक्ष्मी के समान विराजती हैं। अध्यात्मदृष्टि से−ध्यानयज्ञ में परमात्मा का आश्रय प्रातः-सायं दोनों समय की उपासनाएँ उपासक को प्राप्त होती हैं, वे कुछ हँसाती और सुलाती हुई सी उपासक के साथ मिश्रण धर्मवाली होती हैं ॥६॥