Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 112 / 9

नि षु सी॑द गणपते ग॒णेषु॒ त्वामा॑हु॒र्विप्र॑तमं कवी॒नाम् । न ऋ॒ते त्वत्क्रि॑यते॒ किं च॒नारे म॒हाम॒र्कं म॑घवञ्चि॒त्रम॑र्च ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 112 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : नभःप्रभेदनो वैरूपः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : नि । सु । सी॒द॒ । ग॒ण॒ऽप॒ते॒ । ग॒णेषु॑ । त्वाम् । आ॒हुः॒ । विप्र॑ऽतमम् । क॒वी॒नाम् । न । ऋ॒ते । त्वत् । क्रि॒य॒ते॒ । किम् । च॒न । आ॒रे । म॒हाम् । अ॒र्कम् । म॒घ॒ऽव॒न् । चि॒त्रम् । अ॒र्च॒ ॥ १०.११२.९

पदार्थ : (गणपते) हे स्तोता, प्रार्थी, उपासक, जनगणों के पालक ! (गणेषु) गणों के मध्य (सु निसीद) सुष्ठु निविष्ट हो-नितरां प्रविष्ट हो (कवीनाम्) मेधावियों के मध्य में (विप्रतमम्) अत्यन्त मेधावी (त्वाम्) तुझे (आहुः) कहते हैं (त्वत्-ऋते) तेरे बिना (आरे) दूर या निकट में (किञ्चन) कुछ भी कर्म (न क्रियते) नहीं किया जाता है, (मघवन्) हे अध्यात्मधनवन् ! तेरे लिये (महाम्) महान् (चित्रम्) चायनीय-प्रशंसनीय (अर्कम्) अर्चनीय मन्त्र (अर्च) समर्पित करता हूँ ॥९॥

भावार्थ : स्तोता प्रार्थी और उपासक जनों का पालक परमात्मा है, वह उनके अन्दर साक्षात् होता है, समस्त मेधावी विद्वानों को मेधा देनेवाला है, उसके बिना दूर या निकट कोई कर्म नहीं होता, वह कर्माध्यक्ष है, उसके लिये महान् प्रशस्त विचार समर्पित करना चाहिये ॥९॥