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Rigveda / 10 / 113 / 9

भूरि॒ दक्षे॑भिर्वच॒नेभि॒ॠक्व॑भिः स॒ख्येभि॑: स॒ख्यानि॒ प्र वो॑चत । इन्द्रो॒ धुनिं॑ च॒ चुमु॑रिं च द॒म्भय॑ञ्छ्रद्धामन॒स्या शृ॑णुते द॒भीत॑ये ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 113 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : शतप्रभेदनो वैरूपः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : भूरि॑ । दक्षे॑भिः । व॒च॒नेभिः॑ । ऋक्व॑ऽभिः । स॒ख्येभिः॑ । स॒ख्यानि॑ । प्र । वो॒च॒त॒ । इन्द्रः॑ । धुनि॑म् । च॒ । चुमु॑रिम् । च॒ । द॒म्भय॑न् । श्र॒द्धा॒ऽम॒न॒स्या । शृ॒णु॒ते॒ । द॒भीत॑ये ॥ १०.११३.९

पदार्थ : (दक्षेभिः) बलवालों (ऋक्वभिः) ऋचावालों-मन्त्रवालों (सख्येभिः) मित्रभाववालों (वचनेभिः) वचनों द्वारा (सख्यानि) मित्रव्यवहारों को (भूरि प्र वोचत) बहु प्रकार से बोलो प्रदर्शित करो (इन्द्रः) जो राजा (धुनिं च) कम्पानेवाले दस्यु को (चुमुरिं च) छीनकर खानेवाले चोर को (दम्भयन्) नष्ट करने के हेतु (दभीतये) दुःखविनाश के लिये (श्रद्धामनस्या) श्रद्धायुक्त मनोभावना से (शृणुते) दुःखहर्त्ता सुनता है, वह राजा होता है ॥९॥

भावार्थ : प्रजाजनों को चाहिये कि राजा से अपने दुःख दूर करने के लिये बलवान् विचारयुक्त मित्रभावपूर्ण वचनों द्वारा प्रार्थनाएँ करें, प्रजा के दुःख के कारणरूप जो कम्पानेवाला शत्रु दस्यु और चुराकर खानेवाले चोर को नष्ट करने के लिये मनोयोग से उनकी सुनता है और उनके दुःख दूर करता है, वह राजा होने योग्य है ॥९॥