Rigveda / 10 / 114 / 7
चतु॑र्दशा॒न्ये म॑हि॒मानो॑ अस्य॒ तं धीरा॑ वा॒चा प्र ण॑यन्ति स॒प्त । आप्ना॑नं ती॒र्थं क इ॒ह प्र वो॑च॒द्येन॑ प॒था प्र॒पिब॑न्ते सु॒तस्य॑ ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 114 | Mantra No : 7
In English:
Seer : sadhrirvairupo dharmo vaa taapasaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : chaturdashaanye mahimaano asya ta.m dhiiraa vaachaa pra Nayanti sapta . aapnaana.m tiirtha.m ka iha pra vochadyena pathaa prapibante sutasya .
Component Words : chatuH.adasha . anye . mahimaanaH . asya . tam . dhiiraaH . vaachaa . pra . nayanti . sapta . aapnaanam . tiirtham . kaH . iha . pra . vochat . yena . pathaa . pra.apibante . sutasya . 10.114.7
In Hindi:
ऋषि : सध्रिर्वैरुपो धर्मो वा तापसः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : चतुः॑ऽदश । अ॒न्ये । म॒हि॒मानः॑ । अ॒स्य॒ । तम् । धीराः॑ । वा॒चा । प्र । न॒य॒न्ति॒ । स॒प्त । आप्ना॑नम् । ती॒र्थम् । कः । इ॒ह । प्र । वो॒च॒त् । येन॑ । प॒था । प्र॒ऽपिब॑न्ते । सु॒तस्य॑ ॥ १०.११४.७
पदार्थ : (अस्य) इस सोम-शान्तस्वरूप परमात्मा के (अन्ये चतुर्दश) अन्य चौदह (महिमानः) महिमारूप भुवन-लोकभूमियाँ भूः, भुवः, स्वः आदि सात शरीर में तथा संसार में सात ऐसे चौदह परमात्मा की महिमारूप हैं, (धीराः) बुद्धिमान् ध्यानी योगीजन (वाचा) वाणी से (तम्) उस परमात्मा को (सप्त प्र नयन्ति) सात-सात महिमाओं को प्रकृष्टरूप में अपने अन्दर बिठाते हैं (आप्नानम्) उस व्याप्त होते हुए (तीर्थम्) संसारसागर से तरानेवाले को (कः) कौन-कोई विरला (इह) इस संसार में (प्र वोचत्) कहे-उसका प्रवचन करे (येन पथा) जिस मार्ग से (सुतस्य) सम्पादित-निष्पादित आनन्दरस के उपासक (प्रपिबन्ते) प्रकृष्टरूप में पान करते हैं ॥७॥
भावार्थ : भूः, भुवः आदि प्राणकेन्द्र शरीर के सात हैं, जो प्राणायामवाले मन्त्र में कहे गये हैं तथा सात लोकस्तर भूः, भुवः आदि संसार में हैं। ये दोनों चौदह उसकी महिमारूप हैं, इनके द्वारा बुद्धिमान् ध्यानी योगीजन उस परमात्मा को अपने अन्दर बिठाते हैं, वह संसारसागर से तरानेवाला है, उपासकजन उसका आनन्दरसपान करते हैं ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : सध्रिर्वैरुपो धर्मो वा तापसः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : चतुः॑ऽदश । अ॒न्ये । म॒हि॒मानः॑ । अ॒स्य॒ । तम् । धीराः॑ । वा॒चा । प्र । न॒य॒न्ति॒ । स॒प्त । आप्ना॑नम् । ती॒र्थम् । कः । इ॒ह । प्र । वो॒च॒त् । येन॑ । प॒था । प्र॒ऽपिब॑न्ते । सु॒तस्य॑ ॥ १०.११४.७
भावार्थ :