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Rigveda / 10 / 116 / 5

नि ति॒ग्मानि॑ भ्रा॒शय॒न्भ्राश्या॒न्यव॑ स्थि॒रा त॑नुहि यातु॒जूना॑म् । उ॒ग्राय॑ ते॒ सहो॒ बलं॑ ददामि प्र॒तीत्या॒ शत्रू॑न्विग॒देषु॑ वृश्च ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 116 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अग्नियुतः स्थौरोऽग्नियूपो वा स्थौरः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : नि । ति॒ग्मानि॑ । भ्रा॒शय॑न् । भ्राश्या॑नि । अव॑ । स्थि॒रा । त॒नु॒हि॒ । या॒तु॒ऽजूना॑म् । उ॒ग्राय॑ । ते॒ । सहः॑ । बल॑म् । द॒दा॒मि॒ । प्र॒ति॒ऽइत्य॑ । शत्रू॑न् । वि॒ऽग॒देषु॑ । वृ॒श्च॒ ॥ १०.११६.५

पदार्थ : (भ्राश्यानि) ज्वलनीय (स्थिरा) स्थिर दृढ़ (तिग्मानि) वज्रास्त्र (नि भ्राशयन्) निरन्तर ज्वलित करता हुआ (यातुजूनाम्) यातनाओं-पीड़ाओं को प्रेरित करनेवाले दुष्ट जनों को (अव तनुहि) नीचे गिरा (ते-उग्राय) तुझ प्रतापी राजा के लिये (सहः बलम्) शत्रु के सहन करने योग्य बल को (ददामि) मैं पुरोहित या शिक्षक देता हूँ (विगदेषु) आह्वानप्रसङ्गों में-संग्रामों में (शत्रून्) शत्रुओं को प्रतीत्य सामने जाकर (वृश्च) छिन्न-भिन्न कर ॥५॥

भावार्थ : राजा सङ्ग्राम में जलते हुए दृढ़ वज्रास्त्रों को निरन्तर चलावे, पीड़ा देनेवाले शत्रुओं को नीचे गिरावे। सङ्ग्रामों में शत्रु के सामने डटकर उन्हें छिन्न-भिन्न कर डाले ॥५॥