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Rigveda / 10 / 116 / 7

इ॒दं ह॒विर्म॑घव॒न्तुभ्यं॑ रा॒तं प्रति॑ सम्रा॒ळहृ॑णानो गृभाय । तुभ्यं॑ सु॒तो म॑घव॒न्तुभ्यं॑ प॒क्वो॒३॒॑ऽद्धी॑न्द्र॒ पिब॑ च॒ प्रस्थि॑तस्य ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 116 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : अग्नियुतः स्थौरोऽग्नियूपो वा स्थौरः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : इ॒दम् । ह॒विः । म॒घ॒ऽव॒न् । तुभ्य॑म् । रा॒तम् । प्रति॑ । सम्ऽरा॑ट् । अहृ॑णानः । गृ॒भा॒य॒ । तुभ्य॑म् । सु॒तः । म॒घ॒ऽव॒न् । तुभ्य॑म् । प॒क्वः॑ । अ॒द्धि । इ॒न्द्र॒ । पिब॑ । च॒ । प्रऽस्थि॑तस्य ॥ १०.११६.७

पदार्थ : (मघवन्) हे राजसूय यज्ञ को प्राप्त या संस्कारयज्ञ से संस्कृत (इन्द्र) हे राजन् ! या आत्मन् ! (तुभ्यम्) तेरे लिये (इदं हविः) यह उपहाररूप या खाने योग्य (रातम्) दिये हुए को (सम्राट्) सम्यक् राजमान हुआ (अहृणानः) निस्सङ्कोच हुआ-निर्लज्ज हुआ (प्रति गृभाय) स्वीकार कर या ले (तुभ्यम्) तेरे लिये (सुतः) निष्पादित सोमरस उसे (पिब) पी (च) और (तुभ्यम्) तेरे लिये (पक्वः) पका हुआ भोजन पदार्थ (प्रस्थितस्य) समर्पित है (अद्धि) उसे खा ॥७॥

भावार्थ : राजा जब राजसूययज्ञ में राजपद को प्राप्त होता है-राजा बनता है तब उसके लिये उपहार भेंट दी जानी चाहिये, उसके लिये पीने को सोमरस और खाने को पौष्टिक पकवान भेंट करने चाहिये एवं जब आत्मा वेदारम्भ संस्कार से संस्कृत हो जावे, तब उसे प्राशन के लिये रस, दूध, दही आदि और पके हुए मिष्ठान्न आदि देना चाहिये ॥७॥