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Rigveda / 1 / 191 / 8

उत्पु॒रस्ता॒त्सूर्य॑ एति वि॒श्वदृ॑ष्टो अदृष्ट॒हा। अ॒दृष्टा॒न्त्सर्वा॑ञ्ज॒म्भय॒न्त्सर्वा॑श्च यातुधा॒न्य॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 191 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : अबोषधिसूर्याः | छन्द : निचृदनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब सूर्य के दृष्टान्त से उक्त विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : उत्। पु॒रस्ता॑त्। सूर्यः॑। ए॒ति॒। वि॒श्वऽदृ॑ष्टः। अ॒दृ॒ष्ट॒ऽहा। अ॒दृष्टा॑न्। सर्वा॑न्। ज॒म्भय॑न्। सर्वाः॑। च॒। या॒तु॒ऽधा॒न्यः॑ ॥ १.१९१.८

पदार्थ : हे वैद्यजनो ! तुमको जैसे (सर्वान्) सब पदार्थ (अदृष्टान्) जो कि न देखे गये उनको (जम्भयन्) अङ्ग-अङ्ग के साथ दिखलाता हुआ (अदृष्टहा) जो नहीं देखा गया अन्धकार उसको विनाशनेवाला (विश्वदृष्टः) संसार में देखा (सूर्यः) सूर्यमण्डल (पुरस्तात्) पूर्व दिशा में (उदेति) उदय को प्राप्त होता है वैसे (सर्वाः) (च) (यातुधान्यः) सभी दुराचारियों को धारण करनेवाली दुर्व्यथा निवारण करनी चाहिये ॥ ८ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य अन्धकार को निवारण करके प्रकाश को उत्पन्न करता है, वैसे वैद्यजनों को विषहरण ओषधियों से विषों को निर्मूल करना विनाशना चाहिये ॥ ८ ॥