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Rigveda / 1 / 191 / 11

इ॒य॒त्ति॒का श॑कुन्ति॒का स॒का ज॑घास ते वि॒षम्। सो चि॒न्नु न म॑राति॒ नो व॒यं म॑रामा॒रे अ॑स्य॒ योज॑नं हरि॒ष्ठा मधु॑ त्वा मधु॒ला च॑कार ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 191 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : अबोषधिसूर्याः | छन्द : निचृद्ब्राह्म्यनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अब विष हरनेवाले पक्षी के निमित्त को ले विष हरने के विषय को कहते हैं।

पदपाठ : इ॒य॒त्ति॒का। श॒कु॒न्ति॒का। स॒का। ज॒घा॒स॒। ते॒। वि॒षम्। सो इति॑। चि॒त्। नु। न। म॒रा॒ति॒। नो इति॑। व॒यम्। म॒रा॒म॒। आ॒रे। अ॒स्य॒। योज॑नम्। ह॒रि॒ऽस्थाः। मधु॑। त्वा॒। म॒धु॒ला। च॒का॒र॒ ॥ १.१९१.११

पदार्थ : हे विष के भय से डरते हुए जन ! जो (इयत्तिका) इतने विशेष देश में हुई (शकुन्तिका) कपिञ्जली पक्षिणी है (सका) वह (ते) तेरे (विषम्) विष को (जघास) खा लेती है (सो, चित्, नु) वह भी शीघ्र (न) नहीं (मराति) मरे और (वयम्) हम लोग (नो) न (मराम) मारे जायें और (अस्य) इस उक्त पक्षिणी के संयोग से विष का (योजनम्) योग (आरे) दूर होता है। हे विषधारी (हरिष्ठाः) विषहरण में स्थिर विष हरनेवाले वैद्य ! (त्वा) तुझे (मधु) मधुरता को (चकार) प्राप्त करता है (यही) इसकी (मधुला) मधुरता ग्रहण कराने और विष हरनेवाली विद्या है ॥ ११ ॥

भावार्थ : मनुष्य जो विष हरनेवाले पक्षी हैं, उन्हें पालन कर उनसे विष हराया करें ॥ ११ ॥