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Rigveda / 10 / 122 / 4

य॒ज्ञस्य॑ के॒तुं प्र॑थ॒मं पु॒रोहि॑तं ह॒विष्म॑न्त ईळते स॒प्त वा॒जिन॑म् । शृ॒ण्वन्त॑म॒ग्निं घृ॒तपृ॑ष्ठमु॒क्षणं॑ पृ॒णन्तं॑ दे॒वं पृ॑ण॒ते सु॒वीर्य॑म् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 122 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : चित्रमहा वासिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : य॒ज्ञस्य॑ । के॒तुम् । प्र॒थ॒मम् । पु॒रःऽहि॑तम् । ह॒विष्म॑न्तः । ई॒ळ॒ते॒ । स॒प्त । वा॒जिन॑म् । शृ॒ण्वन्त॑म् । अ॒ग्निम् । घृ॒तऽपृ॑ष्ठम् । उ॒क्षण॑म् । पृ॒णन्त॑म् । दे॒वम् । पृ॒ण॒ते । सु॒ऽवीर्य॑म् ॥ १०.१२२.४

पदार्थ : (यज्ञस्य) अध्यात्मयज्ञ के (केतुम्) प्रज्ञापक, प्रसाधक, प्रेरक (प्रथमं पुरोहितम्) प्रमुख पुरोहित (वाजिनम्) अमृतान्नवाले (हविष्मन्तम्) आत्मसमर्पितवाले (शृण्वन्तम्) प्रार्थना को सुननेवाले स्वीकार करनेवाले (घृतपृष्ठम्) तेजपुञ्ज (उक्षणम्) सुखवर्षक (सुवीर्यम्) शोभन बलवाले (पृणते पृणन्तम्) स्तुतियों द्वारा तृप्त करनेवाले के लिये तृप्त करनेवाले परमात्मा को (सप्त) मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, श्रोत्र, नेत्र, वाणी ये सात (ईळते) स्तुति करते हैं ॥४॥

भावार्थ : अध्यात्मयज्ञ के प्रेरक जगत् के प्रथम से धारक, मोक्ष में अमृतान्न के देनेवाले, प्रार्थना स्वीकार करनेवाले, तेजस्विरूप शोभन बलदायक तृप्तिकारक परमात्मा की मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, श्रोत्र, नेत्र और वाणी द्वारा स्तुति करनी चाहिये ॥४॥