Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 126 / 8

यथा॑ ह॒ त्यद्व॑सवो गौ॒र्यं॑ चित्प॒दि षि॒ताममु॑ञ्चता यजत्राः । ए॒वो ष्व१॒॑स्मन्मु॑ञ्चता॒ व्यंह॒: प्र ता॑र्यग्ने प्रत॒रं न॒ आयु॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 126 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : कुल्मलबर्हिषः शैलूषिः, अंहोभुग्वा वामदेव्यः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : आर्चीस्वराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यथा॑ । ह॒ । त्यत् । व॒स॒वः॒ । गौ॒र्य॑म् । चि॒त् । प॒दि । सि॒ताम् । अमु॑ञ्चत । य॒ज॒त्राः॒ । ए॒वो इति॑ । सु । अ॒स्मत् । मु॒ञ्च॒त॒ । वि । अंहः॑ । प्र । ता॒रि॒ । अ॒ग्ने॒ । प्र॒ऽत॒रम् । नः॒ । आयुः॑ ॥ १०.१२६.८

पदार्थ : (वसवः-यजत्राः) हे शरीर में बसानेवाले तथा श्रेष्ठ मार्ग में सङ्गत स्थिर करनेवाले वरुण आदि ! (गौर्यं चित् पदि सिताम्) सुन्दरी गौ को या शोभना वेदवाक्-मन्त्रवाणी को भी सर्वतः पादबद्धा पैरों में बन्धी या पदशः छन्दों में बन्धी वेदवाक्-मन्त्रवाणी को (यथा-अमुञ्चत) जैसे चरने के लिये किसान या प्रचार के लिये छोड़ देते हैं-पद पद खोलते विद्वान् ऐसे हमें मोक्ष में विचरने के लिये छोड़ दो (एव उ सु-अस्मत्-अंहः-वि मुञ्चत) ऐसे ही सुगमतया हमें पाप से छुड़ाओ ॥८॥

भावार्थ : शरीर में बसानेवाले बसाने के कारणभूत श्रेष्ठमार्ग देवयानमार्ग में सङ्गत कराने-कराने के निमित्तभूत देवगण इस शरीर-बन्धन से छुड़ा सकते हैं, मोक्ष में विचरण करने के लिये पाप से बचने पर, वैराग्य होने पर ॥८॥