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Rigveda / 10 / 127 / 5

नि ग्रामा॑सो अविक्षत॒ नि प॒द्वन्तो॒ नि प॒क्षिण॑: । नि श्ये॒नास॑श्चिद॒र्थिन॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 127 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : कुशिकः सौभरो, रात्रिर्वा भारद्वाजी | देवता : रात्रिस्तवः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : नि । ग्रामा॑सः । अ॒वि॒क्ष॒त॒ । नि । प॒त्ऽवन्तः । नि । प॒क्षिणः॑ । नि । श्ये॒नासः॑ । चि॒त् । अ॒र्थिनः॑ ॥ १०.१२७.५

पदार्थ : (ग्रामासः) जनसमूह रात्रि में (नि-अविक्षत) शयन करते हैं-करें (पद्वन्तः-नि) पैरवाले पशु शयन करें (पक्षिणः-नि) पक्षी भी शयन करें (श्येनासः-अर्थिनः) तीव्र गतिमान् भी शयन करें (चित्-नि) थकावट दूर करने के लिए भी शयन करें।

भावार्थ : रात्रि में मनुष्य पशु पक्षी शान्तिप्रयोजन साधने के लिए शयन करें ॥५॥