Rigveda / 10 / 138 / 5
अयु॑द्धसेनो वि॒भ्वा॑ विभिन्द॒ता दाश॑द्वृत्र॒हा तुज्या॑नि तेजते । इन्द्र॑स्य॒ वज्रा॑दबिभेदभि॒श्नथ॒: प्राक्रा॑मच्छु॒न्ध्यूरज॑हादु॒षा अन॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 138 | Mantra No : 5
In English:
Seer : a~Nga auravaH | Devta : indra: | Metre : viraaDjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : ayuddhaseno vibhvaa vibhindataa daashadvRRitrahaa tujyaani tejate . indrasya vajraadabibhedabhishnathaH praakraamachChundhyuurajahaaduShaa anaH .
Component Words : ayuddha.asenaH . vi.abhvaa . vi.abhindataa . daashat . vRRitra.ahaa . tujyaani . tejate . indrasya . vajraat . abibhet . abhi.ashnathaH . pra . akraamat . shundhyuuH . ajahaat . uShaaH . anaH . 10.138.5
In Hindi:
ऋषि : अङ्ग औरवः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : अयु॑द्धऽसेनः । वि॒ऽभ्वा॑ । वि॒ऽभि॒न्द॒ता । दाश॑त् । वृ॒त्र॒ऽहा । तुज्या॑नि । ते॒ज॒ते॒ । इन्द्र॑स्य । वज्रा॑त् । अ॒बि॒भे॒त् । अ॒भि॒ऽश्नथः॑ । प्र । अ॒क्रा॒म॒त् । शु॒न्ध्यूः । अज॑हात् । उ॒षाः । अनः॑ ॥ १०.१३८.५
पदार्थ : (अयुद्धसेनः) युद्ध न किया जा सके जिसके साथ, ऐसी सेनावाला (विभ्वा) सर्वशक्तियों से व्याप्त पूर्ण (विभिन्दता) अपने बलों से शत्रुबलों का विदारण करनेवाला (वृत्रहा) शत्रुनाशक (तुज्यानि-तेजते) हिंसक शस्त्रों को तीक्ष्ण करता है (दाशत्) अपनी प्रजाओं को अभय देता है (इन्द्रस्य-अभिश्नथः-वज्रात्) राजा के हिंसक वज्र से (अबिभेत्) शत्रु भय को प्राप्त होता है (शुन्ध्यूः) संग्रामभूमि का शोधन करनेवाला राजा (प्र अक्रामत्) आगे बढ़े (उषाः) विजय की कामना करती हुई सेना (अनः) रथ को-रथस्थ सैनिकगण को (अजहात्) संग्रामभूमि में युद्ध के लिये छोड़ दे ॥५॥
भावार्थ : राजा की सेना सबल, स्वयं शक्तियों से पूर्ण तीक्ष्ण शस्त्रों को चलानेवाला हो, उसके शस्त्रप्रहार से शत्रु भय करे, संग्राम में शत्रुओं का सफाया करनेवाली सेना भी संग्राम में डट जानेवाली होनी चाहिए ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : अङ्ग औरवः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : अयु॑द्धऽसेनः । वि॒ऽभ्वा॑ । वि॒ऽभि॒न्द॒ता । दाश॑त् । वृ॒त्र॒ऽहा । तुज्या॑नि । ते॒ज॒ते॒ । इन्द्र॑स्य । वज्रा॑त् । अ॒बि॒भे॒त् । अ॒भि॒ऽश्नथः॑ । प्र । अ॒क्रा॒म॒त् । शु॒न्ध्यूः । अज॑हात् । उ॒षाः । अनः॑ ॥ १०.१३८.५
भावार्थ :