Rigveda / 10 / 141 / 4
इ॒न्द्र॒वा॒यू बृह॒स्पतिं॑ सु॒हवे॒ह ह॑वामहे । यथा॑ न॒: सर्व॒ इज्जन॒: संग॑त्यां सु॒मना॒ अस॑त् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 141 | Mantra No : 4
In English:
Seer : agnistaapasaH | Devta : vishvedevaa: | Metre : anuShTup | Tone : gaandhaaraH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : indravaayuu bRRihaspati.m suhaveha havaamahe . yathaa naH sarva ijjanaH sa.mgatyaa.m sumanaa asat .
Component Words : indravaayuu iti . bRRihaspatim . su.ahavaa . iha . havaamahe . yathaa . naH . sarvaH . it . janaH . sam.agatyaam . su.amanaaH . asat . 10.141.4
In Hindi:
ऋषि : अग्निस्तापसः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
विषय :
पदपाठ : इ॒न्द्र॒वा॒यू इति॑ । बृह॒स्पति॑म् । सु॒ऽहवा॑ । इ॒ह । ह॒वा॒म॒हे॒ । यथा॑ । नः॒ । सर्वः॑ । इत् । जनः॑ । सम्ऽग॑त्याम् । सु॒ऽमनाः॑ । अस॑त् ॥ १०.१४१.४
पदार्थ : (सुहवा-इन्द्रवायू) उत्तम आह्वान करने योग्य सभाध्यक्ष और सेनाध्यक्ष को (बृहस्पतिम्) बहुतों का पालन करनेवाले वैश्य को (हवामहे) हम आमन्त्रित करते हैं, (यथा नः) जिससे कि हमारे (सर्वः-इत्-जनः) हमारा सब जनसमूह (सङ्गत्याम्) परस्पर सङ्गति में (सुमनाः) प्रसन्नमन (असत्) हो जावे ॥४॥
भावार्थ : प्रजाजन सभाध्यक्ष और सेनाध्यक्षों को तथा प्रजा के पालक वैश्य को आमन्त्रित करें और सब परस्पर संगति में होकर प्रसन्न रहें, ऐसे उपाय पर विचार करें ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : अग्निस्तापसः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः
पदपाठ : इ॒न्द्र॒वा॒यू इति॑ । बृह॒स्पति॑म् । सु॒ऽहवा॑ । इ॒ह । ह॒वा॒म॒हे॒ । यथा॑ । नः॒ । सर्वः॑ । इत् । जनः॑ । सम्ऽग॑त्याम् । सु॒ऽमनाः॑ । अस॑त् ॥ १०.१४१.४
भावार्थ :