Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 143 / 2

त्यं चि॒दश्वं॒ न वा॒जिन॑मरे॒णवो॒ यमत्न॑त । दृ॒ळ्हं ग्र॒न्थिं न वि ष्य॑त॒मत्रिं॒ यवि॑ष्ठ॒मा रज॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 143 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अत्रिः साङ्ख्यः | देवता : अश्विनौ | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय :

पदपाठ : त्यम् । चि॒त् । अश्व॑म् । न । वा॒जिन॑म् । अ॒रे॒णवः॑ । यम् । अत्न॑त । दृ॒ळ्हम् । ग्र॒न्थिम् । न । वि । स्य॒त॒म् । अत्रि॑म् । यवि॑ष्ठम् । आ । रजः॑ ॥ १०.१४३.२

पदार्थ : (यं त्यं चित्) जिस उस ही (वाजिनम्-अश्वं न) बलवान् घोड़े की भाँति भोक्ता आत्मा को (अरेणवः-अत्नत) न जाती हुई वासनाएँ तानती हैं-खींचती हैं (दृढं ग्रन्थिं न) दृढ़ ग्रन्थिवाले ग्रन्थि में  बँधे जैसे (यविष्ठम्-अत्रिम्) अत्यन्त युवा भोक्ता आत्मा को (विष्यतम्) हे अध्यापक, उपदेशक ! तुम छुड़ाते हो (आ रजः) जब तक राग रहता है ॥२॥

भावार्थ : घोड़े के समान बलवान् आत्मा जब भोक्ता बन जाता है, तो उसके अन्दर वर्तमान वासनाएँ ऐसे अपने ताने बने में फँसा लेती हैं-आकर्षित कर लेती हैं, फिर यह दृढ़ बन्धन में फँस जाता है, ऐसे उपासक और उपदेशक अपने अध्यात्मप्रवचनों द्वारा इसके राग को छिन्न-भिन्न करके छुड़ाते हैं, निर्बन्धन बना देते हैं ॥२॥