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Rigveda / 10 / 150 / 5

अ॒ग्निरत्रिं॑ भ॒रद्वा॑जं॒ गवि॑ष्ठिरं॒ प्राव॑न्न॒: कण्वं॑ त्र॒सद॑स्युमाह॒वे । अ॒ग्निं वसि॑ष्ठो हवते पु॒रोहि॑तो मृळी॒काय॑ पु॒रोहि॑तः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 150 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : मृळीको वासिष्ठः | देवता : अग्निः | छन्द : उपरिष्टाज्योति | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अ॒ग्निः । अत्रि॑म् । भ॒रत्ऽवा॑जम् । गवि॑ष्ठिरम् । प्र । आ॒व॒त् । नः॒ । कण्व॑म् । त्र॒सद॑स्युम् । आ॒ऽह॒वे । अ॒ग्निम् । वसि॑ष्ठः । ह॒व॒ते॒ । पु॒रःऽहि॑तः । मृ॒ळी॒काय॑ । पु॒रःऽहि॑तः ॥ १०.१५०.५

पदार्थ : (अग्निः) अग्रणेता परमात्मा (अत्रिम्) काम, क्रोध, लोभ दोषत्रय से रहित विद्वान् को या वाणी को (भरद्वाजम्) अमृतान्न को धारण करनेवाले जीवन्मुक्त को या मन को (गविष्ठिरम्) स्तुति में स्थिर-स्तुतिपरायण विद्वान् को या श्रोत्र को (कण्वम्) सूक्ष्मदर्शी विद्वान् को या नेत्र को (त्रसदस्युम्) धारणीय परमात्मानन्ददर्शी विद्वान् को या बुद्धितत्त्व को (नः) हमारे इन सबकी (प्र आवत्) प्रकृष्टरूप से रक्षा करता है (आहवे) स्तुतिप्रसङ्ग में (पुरोहितः-वसिष्ठः) पूर्व से स्थित विद्यागुणों में अत्यन्त बसनेवाला उपासक (अग्निं हवते) परमात्मा की उपासना करता है (मृळीकाय पुरोहितः) सुख के लिये पुरोहित प्रार्थना करता है ॥५॥

भावार्थ : परमात्मा काम, क्रोध, लोभ से रहित जीवन्मुक्त स्तुतिपरायण सूक्ष्मदर्शी धारण करने योग्य परमात्मानन्द के अनुभवी विद्वानों की तथा हमारे वाणी, मन, श्रोत्र, नेत्र और बुद्धि की रक्षा करता है, हमारे उपासक होने पर उपासक परमात्मा में अधिक बसा हुआ होता है तथा सुख के लिए परमात्मा की प्रार्थना करता है, वह उसे स्वीकार करता है ॥५॥