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Rigveda / 2 / 2 / 3

तं दे॒वा बु॒ध्ने रज॑सः सु॒दंस॑सं दि॒वस्पृ॑थि॒व्योर॑र॒तिं न्ये॑रिरे। रथ॑मिव॒ वेद्यं॑ शु॒क्रशो॑चिषम॒ग्निं मि॒त्रं न क्षि॒तिषु॑ प्र॒शंस्य॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 2 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : तं। दे॒वाः। बु॒ध्ने। रज॑सः। सु॒ऽदंस॑सम्। दि॒वःपृ॑थि॒व्योः। अ॒र॒तिम्। नि। ए॒रि॒रे॒। रथ॑म्ऽइव। वेद्य॑म्। शु॒क्रऽशो॑चिषम्। अ॒ग्निम्। मि॒त्रम्। न। क्षि॒तिषु॑। प्र॒ऽशंस्य॑म्॥

पदार्थ : जो (देवाः) विद्वान् (बुध्ने) अन्तरिक्ष में वा (रजसः) लोक के बीच में वा (दिवस्पृथिव्योः) सूर्य पृथिवी के बीच (अरतिम्) प्राप्त (सुदंससम्) जिससे सुन्दर काम बनते हैं (शुक्रशोचिषम्) और शीघ्रता करनेवाला तेज जिसमें विद्यमान (वेद्यम्) जानने योग्य (तम्) उस (अग्निम्) अग्नि को (क्षितिषु) पृथिवियों में (प्रशंस्यम्) प्रशंसनीय (मित्रम्) मित्र के (न) समान वा (रथमिव) रथ के समान (न्येरिरे) निरन्तर कँपाते अर्थात् चलाते हैं, वे अत्यन्त सुख को क्यों न प्राप्त होवें ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! यदि आप लोग अन्तरिक्ष में स्थित पदार्थों में वर्त्तमान अग्नि को जानकर रथ के समान कार्यों में चलावें, तो वह मित्र के समान कार्यों को सिद्ध करे ॥३॥