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Rigveda / 10 / 161 / 3

स॒ह॒स्रा॒क्षेण॑ श॒तशा॑रदेन श॒तायु॑षा ह॒विषाहा॑र्षमेनम् । श॒तं यथे॒मं श॒रदो॒ नया॒तीन्द्रो॒ विश्व॑स्य दुरि॒तस्य॑ पा॒रम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 161 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : यक्ष्मनाशनः प्राजापत्यः | देवता : राजयक्ष्मघ्नम् | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : स॒ह॒स्र॒ऽअ॒क्षेण॑ । श॒तऽशा॑रदेन । श॒तऽआ॑युषा । ह॒विषा॑ । आ । अ॒हा॒र्ष॒म् । ए॒न॒म् । श॒तम् । यथा॑ । इ॒मम् । श॒रदः॑ । नया॑ति । इन्द्रः॑ । विश्व॑स्य । दुः॒ऽइ॒तस्य॑ । पा॒रम् ॥ १०.१६१.३

पदार्थ : (शतशारदेन) सौ शरत्काल से (शतायुषा) सौ वर्ष आयु जिससे होती है, वैसे (हविषा) होम द्रव्य से (एनम्) इस रोगी को (आहार्षम्) ले आया हूँ (यथा) जिससे (शतं शरदः) इस रोगी को सौ शरत्काल तक (विश्वस्य-दुरितस्य) सर्व रोग दुःख के (पारम्) पार (इन्द्रः-नयाति) वैद्य ले जावे ॥३॥

भावार्थ : उतम वैद्य होम द्रव्य के द्वारा सौ वर्ष तक समस्त रोग दुःख से पार कर देता है, कर दिया करता है, कर दे ॥३॥