Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 2 / 2 / 5

स होता॒ विश्वं॒ परि॑ भूत्वध्व॒रं तमु॑ ह॒व्यैर्मनु॑ष ऋञ्जते गि॒रा। हि॒रि॒शि॒प्रो वृ॑धसा॒नासु॒ जर्भु॑र॒द्द्यौर्न स्तृभि॑श्चितय॒द्रोद॑सी॒ अनु॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 2 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : सः। होता॑। विश्व॒म्। परि॑। भू॒तु॒। अ॒ध्व॒रम्। तम्। ऊँ॒ इति॑। ह॒व्यैः। मनु॑षः। ऋ॒ञ्ज॒ते॒। गि॒रा। हि॒रि॒ऽशि॒प्रः। वृ॒ध॒सा॒नासु॑। जर्भु॑रत्। द्यौः। न। स्तृऽभिः॑। चि॒त॒य॒त्। रोद॑सी॒ इति॑। अनु॑॥

पदार्थ : जो (हिरिशिप्रः) ऐसा है कि जिसके मुख्यावयव पदार्थ को हरने और (होता) ग्रहण करनेवाले हैं, (तम्) उस (विश्वम्) समस्त (अध्वरम्) न नष्ट करने योग्य शिल्पसाध्य व्यवहार को (परि भूतु) विचारे और उसको (उ) तर्क-वितर्क के साथ (हव्यैः) ग्रहण करने योग्य पदार्थों और (गिरा) वाणी से (मनुषः) मनुष्य (ञ्जते) प्रसिद्ध करते हैं। जो अग्नि (वृधसानासु) बढ़ी हुई प्रजाओं में (रोदसी) द्यावापृथिवी के (अनु) अनुकूल (द्यौः) सूर्य (स्तृभिः) नक्षत्र अर्थात् तारागणों के साथ (न) जैसे वैसे पदार्थों से (चितयत्) चेतन करे वा (जर्भुरत्) निरन्तर पदार्थों को धारण करे, (सः) वह सबको कार्यों में अच्छे प्रकार युक्त कराने योग्य है ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे सूर्य नक्षत्रों को प्रकाशित करता है, वैसे यह अग्नि समस्त विश्व को प्रकाशित करता है। जो पढ़ने और सुनने से अग्नि विद्या का ग्रहण करते हैं, वे सुभूषित होते हैं ॥५॥