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Rigveda / 10 / 164 / 3

यदा॒शसा॑ नि॒:शसा॑भि॒शसो॑पारि॒म जाग्र॑तो॒ यत्स्व॒पन्त॑: । अ॒ग्निर्विश्वा॒न्यप॑ दुष्कृ॒तान्यजु॑ष्टान्या॒रे अ॒स्मद्द॑धातु ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 164 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : प्रचेताः | देवता : दुःस्वप्नघ्नम् | छन्द : भुरिगार्चीत्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यत् । आ॒ऽशसा॑ । निः॒ऽशसा॑ । अ॒भि॒ऽशसा॑ । उ॒प॒ऽआ॒रि॒म । जाग्र॑तः । यत् । स्व॒पन्तः॑ । अ॒ग्निः । विश्वा॑नि । अप॑ । दुः॒ऽकृ॒तानि॑ । अजु॑ष्टानि । आ॒रे । अ॒स्मत् । दा॒धा॒तु॒ ॥ १०.१६४.३

पदार्थ : (यत्) जो मानसिक दुष्कर्म (आशसा) आकाङ्क्षा से-इच्छा से (निः शसा) बिना आकाङ्क्षा-अनिच्छा से (अभिशसा) अभिगत काङ्क्षा वासना से (जाग्रतः) जागते हुए (यत्) जिसे वो (स्वपन्तः) सोते हुए (उपारिम) उपगत हो-प्राप्त हो (अग्निः) ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा (विश्वानि दुष्कृतानि-अजुष्टानि) मानसिक पाप फल सेवन से प्रथम ही (अस्मत्) हमारे से (आरे) दूर (अप दधातु) फेंक दे-नष्ट कर दे ॥३॥

भावार्थ : परमात्मा की स्तुति उपासना करने से जो मानसिक पाप कर्म में न आए हुए केवल मन में ही हैं, वे इच्छापूर्वक हों या अनिच्छा से या पूर्व की वासना से प्रथम ही नष्ट हो जाया करते हैं, अतः शिवसंकल्प के साथ परमात्मा की स्तुति उपासना करनी चाहिए ॥३॥