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Rigveda / 2 / 2 / 9

ए॒वा नो॑ अग्ने अ॒मृते॑षु पूर्व्य॒ धीष्पी॑पाय बृ॒हद्दि॑वेषु॒ मानु॑षा। दुहा॑ना धे॒नुर्वृ॒जने॑षु का॒रवे॒ त्मना॑ श॒तिनं॑ पुरु॒रूप॑मि॒षणि॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 2 | Sukta : 2 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदः शौनकः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदपाठ : ए॒व। नः॒। अ॒ग्ने॒। अ॒मृते॑षु। पू॒र्व्य॒। धीः। पी॒पा॒य॒। बृ॒हत्ऽदि॑वेषु। मानु॑षा। दुहा॑ना। धे॒नुः। वृ॒जने॑षु। का॒रवे॑। त्मना॑। श॒तिन॑म्। पु॒रु॒ऽरूप॑म्। इ॒षणि॑॥

पदार्थ : हे (पूर्व्य) पूर्वज विद्वानों ने विद्या पढ़ाकर किये (अग्ने) विद्वान् ! आप (त्मना) अपने से जो (बृहद्दिवेषु) बहुत प्रकाश जिनमें विद्यमान उन (वृजनेषु) बलयुक्त (अमृतेषु) विनाश और उत्पत्तिरहित जीवों में (मानुषा) मनुष्य सम्बन्धी सुख और (इषणि) इच्छा के निमित्त (शतिनम्) अपरिमित असंख्य (पुरुरूपम्) जिसमें बहुत रूप विद्यमान उस व्यवहार को (दुहाना) दोहती पूरा करती हुई (धेनुः) वाणी ही है। उन सबकी प्राप्ति कराते हुए (एव) ही (नः) हम लोगों के लिये और (कारवे) करनेवाले के लिये (धीः) बुद्धि और कर्मों की (पीपाय) वृद्धि कीजिये ॥९॥

भावार्थ : विज्ञान चाहनेवाले जनों को शिष्ट महात्मा जनों से पाई हुई बुद्धि को प्राप्त होकर बहुत प्रकार के पदार्थविज्ञान से मनुष्य जन्म के धर्म अर्थ काम और मोक्षरूपी फलों को प्राप्त होना चाहिये ॥९॥